सरकारी नौकरी में employee बॉन्ड के वैधता
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14 मई, 2025 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विजया बैंक एवं अन्य बनाम प्रशांत बी. नरनावरे मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया, जिसमें नौकरी में employee बॉन्ड के वैधता अर्थात निर्बंधात्मक रोजगार खंडों की वैधता तथा संवैधानिक एवं संविदात्मक सिद्धांतों के साथ उनके अनुपालन को संबोधित किया गया। जिसमें उच्च न्यायालय ने ऐसी शर्तों को भारतीय संविदा अधिनियम 1872 की धारा 27 के अधीन व्यापार के अवरोधक मानते हुए ऐसी निर्बंधनात्मक शर्तों को शून्य मना । जिससे व्यथित होकर बैंक ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील संस्थित की गई । जिसमे उच्च न्यायालय के निर्णय को उलट दिया और employee बॉन्ड के निष्पादन व ऐसी निर्बंधनात्मक शर्तों को सही माना ।
मामले की पृष्ठभूमि एवं तथ्य
रोजगार की शर्तें और विवाद
- 1999 में, प्रतिवादी ने विजया बैंक में प्रोबेशनरी असिस्टेंट मैनेजर के रूप में पद ग्रहण किया तथा बाद में उसे मिडिल मैनेजमेंट स्केल-II के पद पर पदोन्नत किया गया।
- 2006 में, बैंक ने 349 अधिकारियों के लिए एक भर्ती अधिसूचना जारी की, जिसमें एक खंड 9(w) था, जिसके अनुसार चयनित उम्मीदवारों को तीन वर्ष से पूर्व पद छोड़ने पर 2 लाख रुपये का क्षतिपूर्ति बंधपत्र निष्पादित कारना होगा (पैरा 2-4)।
- प्रत्यर्थी ने, अपने पूर्व पद से इस्तीफा दे दिया और 28 सितंबर, 2007 को MMG-III के पद के नियुक्ति पत्र के खंड 11(k)की शर्त को स्वीकार करते हुए में वरिष्ठ प्रबंधक के रूप में पद ग्रहण कर लिया गया ।
- खंड 11(k) में शर्त यह थी कि – “आपको बैंक में पद ग्रहण की तिथि से कम से कम 3 वर्ष तक सेवा करनी होगी और 2.00 लाख रुपये का क्षतिपूर्ति बंधपत्र निष्पादित करना होगा। यदि आप 3 वर्ष की नियत न्यूनतम अवधि पूर्ण होने से पूर्व ही बैंक सेवाओं से इस्तीफा देते हैं, तो आपको उक्त राशि का भुगतान करना होगा। इस उद्देश्य के लिए, आपको अपनी पदस्थापना वालेराज्य में खरीदा गया 100 रुपये का एक खाली गैर-न्यायिक शपथ पत्र लाना होगा।”(पैरा 5)।
- 17 जुलाई, 2009 को, तीन वर्ष पूर्ण करने से पूर्व, प्रतिवादी ने IDBI बैंक में पद ग्रहण करने के लिए इस्तीफा दे दिया और विरोध के अधीन 2 लाख रुपये का संदाय किया (पैरा 6)।
- उसने खंड 11(k) को उच्च न्यायालय में चुनौती, यह तर्क देते हुए कि यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तथा लोक नीति के विरुद्ध है (पैरा 7)।
मुख्य विचारणीय प्रश्न
उच्चत्तम न्यायालय ने मामले में ने निम्नलिखट प्रश्नोंका परीक्षण किया :
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- क्या नियुक्ति पत्र का खंड 11(k) संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 27 के अधीन व्यापार के अवरोधक( restraint ) है?
- क्या उक्त खंड लोकनीति के विरुद्ध है, जिससे यह संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 23 के प्रतिकूल हो जाता है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है?
उच्चत्तम न्यायालय का निर्णय व विश्लेषण
1. खंड11(k) धारा 27 (व्यापार पर अवरोध) का उल्लंघन नहीं करती है।
- संविदा अधिनियम की धारा 27 में उपबंध किया गया है कि वैध व्यापार या कारबार करने से अवरुद्ध (प्रतिबंध) करने वाले करार शून्य हैं, सिवाय गुडविल विक्रय के मामलों के (पैरा 11)।
- न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय निरंजन शंकर गोलिकरी बनाम सेंचुरी स्पिनिंग (1967) के मामले का अवलोकन किया जिसमे रोजगार के दौरान अधिरोपित प्रतिबंधात्मक शर्त (वैध) और रोजगार के पश्चात प्रतिबंध (संभावित रूप से शून्य) (पैरा 13-14) के बीच अंतर किया। अवधारित किया कि रोजगार के दौरान नकारात्मक शर्ते वैध हैं (पैरा 13)।
- सुपरिन्टेन्डेन्स कम्पनी बनाम कृष्ण मुरगई (1981) – गोलिकरी के ममले में व्यक्त मत की पुष्टि करते हुए कहा कि रोजगार के दौरान सेवा संविदा द्वारा नियत अवधि में अन्यत्र सेवा या कार्य न करने की नकारात्मक शर्त वैध होती है और ऐसे सेवा संविदा प्रवर्तनीय हैं। व्यापार का अवरोधक सिद्धांत रोजगार संविदा की निरंतरता के दौरान कभी भी लागू नहीं होता है; यह मात्र तभी लागू होता है जब संविदा समाप्त हो जाती है। (पैरा 14)।
- इन आधिकारिक मत को देखते हुए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह सुस्थापित विधि है कि रोजगार संविदा के अस्तित्व के दौरान अधिरोपित प्रतिबंधात्मक शर्ते व्यापार या रोजगार के लिए संविदा करने वाले पक्ष की स्वतंत्रता पर कोई रोक नहीं लगाती है। खंड 11 (k) को पढ़ने से ज्ञात होता है कि प्रतिवादी पर न्यूनतम अवधि या 2 लाख का बंधपत्र निष्पादित करने का प्रतिबंध उद्देश्य रोजगार संविदा को आगे बढ़ाना था न कि भविष्य के रोजगार को रोकना। इसलिए, इसे अनुबंध अधिनियम की धारा 27 का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता है।अर्थात भविष्य में रोजगार पर रोक नहीं लगाता परन्तु न्यूनतम कार्यकाल सुनिश्चित करता है, जिससे यह धारा 27 के अधीन वैध हो जाता है।(पैरा 15&16)
2. खंड11(k) लोक नीति के विरुद्ध नहीं है।
- न्यायालय ने केंद्रीय अंतर्देशीय जल परिवहन निगम बनाम ब्रोजो नाथ गांगुली (1986) के निर्णय का अवलोकन करते हुए कहा कि एक मानक प्रारूप रोजगार संविदाओं का निर्वचन से संबंधित विधिक सिद्धांतों को इस प्रकार संक्षेपित किया जा सकता है:-
(i) मानक प्रारूप रोजगार संविदा प्रथम दृष्टया असमान सौदेबाजी शक्ति का साक्ष्य देते हैं।
(ii) जब कभी ऐसे संविदा का कमजोर पक्षकार असम्यक असर / प्रपीडन का अभिवचन करता है या अभिकथन करता है कि संविदा या उसका कोई भी नियम लोक नीति के विरुद्ध है, तो न्यायालय पक्षकारों की असमान स्थिति और उस संदर्भ को ध्यान में रखते हुए ऐसे अभिवचन का परीक्षण करेगा जिसमें संविदात्मक दायित्व निर्मित किए गए थे।
(iii) यह साबित करने का भार कि रोजगार संविदा में प्रतिबंधात्मक शर्ते, वैध रोजगार के अवरोधक नहीं है या लोक नीति के विरुद्ध नहीं है, शर्त लगाने वाले यानी नियोक्ता पर है, कर्मचारी पर नहीं। (पैरा 19)। - लोक नीति सामान्य तौर पर, लोक हित एवं भलाई से जुड़े मामलों से संबंधित होती है। यह समय के साथ विकसित होती है तथा इसका मूल्यांकन निष्पक्षता, तर्कसंगतता और सामाजिक प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए। (पैरा 22-24)।
- गोलिकरी (1967) – कहा गया कि रोजगार संविदा में युक्तियुक्त प्रतिबंध वैध हैं। (पैरा 23)।
न्यायालय का मत : सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक होने के नाते, उसका व्यवहार प्राईवेट नियुक्तियों से बचने के कारण न्यायसंगत है। असामयिक इस्तीफे की स्थिति में, खुली भर्ती प्रतियोगी प्रक्रिया संवैधानिक अनिवार्यता है, जिससे बैंक का दृष्टिकोण उचित है।तथा दक्षता बनाए रखने के लिए न्यूनतम सेवा अवधि की नीतियों की आवश्यकता होती है (पैरा 26-27)। - -2 लाख रुपये का परिनिर्धारित नुकसानी भर्ती लागत तथा प्रशासनिक भार के अनुपात में था (पैरा 28-30)।
अत: खंड 11(k ) अनुचित, आयुकतयुक्त या लोकात्मा विरुद्ध नहीं था, तथा लोक नीति का उल्लंघन नहीं करता था (पैरा 35)।
याद रखने योग्य बातें (keyTakeaways)
- सरकारी नौकरी में प्रतिबंधात्मक शर्तें वैध हैं, यदि वे वैध व्यावसायिक हितों की पूर्ति के लिए लगाई जाती हैं ।
- खंड 11(k) धारा 27 (व्यापार परअवरोध ) का उल्लंघन नहीं करता है क्योंकि यह मात्र न्यूनतम कार्यकाल नियत करता है। अर्थात किसी नौकरी में न्यूनतम अवधि तक सेवा करने की शर्त वैध होती है, यह किसी प्रकार से व्यापर के अवरोध के रूप में नहीं हैं ।
- यदि शर्त नौकरी अर्थात रोजगार समाप्त हो जाने के बाद लागू होनी है यानी किसी अन्य रोजगार में जाने से या अन्य कार्य करने से रोकती है, तो उसे धारा 27 के अधीन व्यापार के अवरोधक माना जा सकता है ।
- रोजगर संविदा में लगाई गई शर्तें न्यसंगत एवं युक्तियुत हों चाहिए और इन्हे साबित करने का भार नियुक्ता पर होता है ।
- लोक नीति लोक हित एवं भलाई के मामलों से संबंधित होती है। जो समय के साथ बदलती रहती है ।
- ₹2 लाख रुपए का बंधपत्र परिनिर्धारित नुकसानी के आनुपातिक था तथा अत्यधिक नहीं था।
- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक न्यूनतम सेवा अवधि नीतियों को लागू कर सकते हैं जिससे कर्मचारियों की संख्या कम न हो और दक्षता बनी रहे।
उद्धरण और संदर्भ (Citations and References)
निर्णय का शीर्षक: विजया बैंक और अन्य बनाम प्रशांत बी नारनावेयर
उद्धरण(Citations) : 2025 आईएनएससी 691
निर्णय की तारीख:14 मई, 2025
पीठ: न्यायमूर्ति पमिदिघनतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची
निष्कर्ष
यह निर्णय प्रतिबंधात्मक नौकरी रोजगार खंडों की वैधता को प्रबलित (मजबूत) करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक संवैधानिक या संविदात्मक सिद्धांतों का उल्लंघन किए बिना युक्तियुक्त कार्यकाल की शर्तें लागू कर सकते हैं। यह निर्णय सरकारी एवं निजी क्षेत्रों में रोजगार संविदाओं के लिए एक पूर्वनिर्णय (precedent) के रूप में लागू होता है, जो कर्मचारी के अधिकारों को संगठनात्मक दक्षता के साथ में संतुलन प्रदान करता है।

