परिभाषा धारा 2 भारतीय साक्ष्य अधिनियम
2.परिभाषाएं: (1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, –
(क) “न्यायालय” शब्द के अन्तर्गत सभी न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट तथा मध्यस्थों के सिवाय साक्ष्य लेने के लिए वैध रूप से प्राधिकृत सभी व्यक्ति आते हैं ;।
(ख) “निश्चायक सबूत” जहां कि इस अधिनियम द्वारा एक तथ्य किसी अन्य तथ्य का निश्चायक सबूत घोषित किया गया है, वहां न्यायालय उस एक तथ्य के साबित हो जाने पर उस अन्य को साबित मानेगा और उसे नासाबित करने के प्रयोजन के लिए साक्ष्य दिए जाने की अनुज्ञा नहीं देगा ;
(ग) “दस्तावेज” से ऐसा कोई विषय अभिप्रेत है जिसको किसी पदार्थ पर अक्षरों, अंकों या चिह्नों के साधन द्वारा या उनमें से एक से अधिक साधनों द्वारा अभिव्यक्त या वर्णित या अन्यथा अभिलेखबद्ध किया गया है जो उस विषय के अभिलेखन के प्रयोजन से उपयोग किए जाने को आशयित हो या उपयोग किया जा सके और इसके अंतर्गत इलेक्ट्रानिक और डिजिटल अभिलेख भी हैं;
दृष्टांत
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- लेख दस्तावेज है ।
- मुद्रित, शिला मुद्रित या फोटोचित्र शब्द दस्तावेज हैं ।
- मानचित्र या रेखांक दस्तावेज है ।
- धातुपट्ट या शिला पर उत्कीर्ण लेख दस्तावेज हैं ।
- उपहासांकन दस्तावेज हैं ।
- ई-मेल, सर्वर लॉग, कंप्यूटर, लैपटॉप या स्मार्ट फोन, मैसेज, वेबसाइट, अवस्थिति साक्ष्य में इलैक्ट्रानिकी अभिलेख और डिजिटल युक्तियों में भंडार किए गए वॉयस मेल मैसेज दस्तावेज हैं ।
(घ) तथ्य के संबंध में, “नासाबित” कोई तथ्य नासाबित हुआ कहा जाता है, जब न्यायालय अपने समक्ष विषयों पर विचार करने के पश्चात् या तो यह विश्वास करे कि उसका अस्तित्व नहीं है, या उसके अनस्तित्व को इतना अधिसम्भाव्य समझे कि उस विशिष्ट मामले की परिस्थितियों में किसी प्रज्ञावान व्यक्ति को इस अनुमान पर कार्य करना चाहिए कि उस तथ्य का अस्तित्व नहीं है ;
(ङ) “साक्ष्य” शब्द से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत आते हैं-
(क) कथन या कोई सूचना, जो इलैक्ट्रानिकी रूप से दी गई है, जिसे न्यायालय जांचाधीन तथ्य के विषयों के सम्बन्ध में अपने सामने साक्षियों द्वारा किए जाने की अनुज्ञा देता हैं, या अपेक्षा करता है; और ऐसे कथन या सूचना मौखिक साक्ष्य कहलाते हैं;
(ख) दस्तावेज के अंतर्गत न्यायालय के निरीक्षण के लिए पेश की गई सब दस्तावेजें, जिनके अंतर्गत इलैक्ट्रानिक या डिजिटल अभिलेख भी हैं; और ऐसी दस्तावेजं दस्तावेजी साक्ष्य कहलाती हैं ।
(च) “तथ्य” से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत आती हैं-
(i) ऐसी कोई वस्तु, वस्तुओं की अवस्था, या वस्तुओं का सम्बन्ध जो इन्द्रियों द्वारा बोधगम्य हो ;
(ii) कोई मानसिक दशा, जिसका भान किसी व्यक्ति को हो ।
दृष्टांत
(क) यह कि अमुक स्थान में अमुक क्रम से अमुक पदार्थ व्यवस्थित हैं, एक तथ्य है ।
(ख) यह कि किसी मनुष्य ने कुछ सुना या देखा, एक तथ्य है ।
(ग) यह कि किसी मनुष्य ने अमुक शब्द कहे, एक तथ्य है ।
(घ) यह कि कोई मनुष्य अमुक राय रखता है, अमुक आशय रखता है, सद्भावपूर्वक या कपटपूर्वक कार्य करता है, या किसी विशिष्ट शब्द को विशिष्ट भाव में प्रयोग करता है, या उसे किसी विशिष्ट संवेदना का भान है या किसी विनिर्दिष्ट समय में था, एक तथ्य है।
(छ) “विवाद्यक तथ्य” से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत, ऐसा कोई भी तथ्य जिस अकेले ही से, या अन्य तथ्यों के संसर्ग में किसी ऐसे अधिकार, दायित्व या निर्योग्यता के, जिसका किसी वाद या कार्यवाही में प्राख्यान या प्रत्याख्यान किया गया है, आता है, अस्तित्व, अनस्तित्व, प्रकृति या विस्तार की उपपत्ति अवश्यमेव होती है ।
स्पष्टीकरण -जब कभी कोई न्यायालय विवाद्यक तथ्य को सिविल प्रक्रिया से सम्बन्धित किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबन्धों के अधीन अभिलिखित करता है, तब ऐसे विवाद्यक के उत्तर में जिस तथ्य का प्राख्यान या प्रत्याख्यान किया जाना है, वह विवादयक तथ्य है ।
दृष्टांत
(i) की हत्या का क अभियुक्त है ।
(ii) उसके विचारण में निम्नलिखित तथ्य विवाद्य हो सकते हैं,
(iii) यह कि क ने ख की मृत्यु कारित की,
(iv) यह कि क का आशय ख की मृत्यु कारित करने का था,
(v) यह कि क को ख से गम्भीर और अचानक प्रकोपन मिला था,
(vi) यह कि ख की मृत्यु कारित करने का कार्य करते समय के चित्त – विकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति जानने में असमर्थ था ।
(ज) “उपधारणा कर सकेगा” जहां कहीं इस अधिनियम द्वारा यह उपबन्धित है कि न्यायालय किसी तथ्य की उपधारणा कर सकेगा, वहां न्यायालय या तो ऐसे तथ्य को साबित हुआ मान सकेगा, यदि और जब तक वह नासाबित नहीं किया जाता है, या उनके सबूत की मांग कर सकेगा ;
(झ) “साबित नहीं हुआ” कोई तथ्य साबित नहीं हुआ कहा जाता है, जब वह न तो साबित किया गया हो और न नासाबित ;
(ञ) “साबित” कोई तथ्य साबित हुआ कहा जाता है, जब न्यायालय अपने समक्ष के विषयों पर विचार करने के पश्चात् या तो यह विश्वास करे कि उस तथ्य का अस्तित्व है या उसके अस्तित्व को इतना अधिसम्भाव्य समझे कि उस विशिष्ट मामले की परिस्थितियों में किसी प्रज्ञावान व्यक्ति को इस अनुमान पर कार्य करना चाहिए कि उस तथ्य का अस्तित्व है।
(ट) “सुसंगत “ एक तथ्य दूसरे तथ्य से सुसंगत कहा जाता है जब कि तथ्यों की सुसंगति से सम्बन्धित इस अधिनियम के उपबन्धों में निर्दिष्ट प्रकारों में से किसी भी प्रकार से वह तथ्य उस दूसरे तथ्य से संसक्त हो ।
(ठ) “उपधारणा करेगा” जहां कहीं इस अधिनियम द्वारा यह निर्दिष्ट है कि न्यायालय किसी तथ्य की उपधारण करेगा, वहां न्यायालय ऐसे तथ्य को साबित मानेगा यदि और जब तक वह नासाबित नहीं किया जाता है ।
(2) इसमें प्रयुक्त शब्द और पद, जो इस अधिनियम में परिभाषित नहीं है किंतु सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, भारतीय न्याय संहिता, 2023 और भारतीय 10 2000 का 21 नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक, 2023 में परिभाषित है, का क्रमशः वहीं अर्थ होगा, जो उनका उक्त अधिनियम और संहिता में है ।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 2 परिभाषा खंड है ।