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शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951) | प्रथम संविधान संशोधन और मूल अधिकारों पर ऐतिहासिक निर्णय

शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ और बिहार राज्य (1951)

परिचय

5 अक्टूबर, 1951 – एक ऐतिहासिक दिन जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ के मामले में संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 की संवैधानिक वैधता पर निर्णय सुनाया। यह फैसला केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं था, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की दिशा तय करने वाला एक अहम मोड़ था। विशेष रूप से अनुच्छेद 31क और 31ख के संबंध में। इस ऐतिहासिक निर्णय ने परीक्षण किया गया कि क्या संसद को अनुच्छेद 368 के अधीन मूल अधिकारों सहित संविधान में संशोधन करने का अधिकार है, और क्या ऐसे संशोधन अनुच्छेद 13(2) द्वारा प्रतिबंधित हैं।

तथ्य और प्रक्रियात्मक पृष्ठभूमि

भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात , सरकार ने जमींदारी प्रथा को समाप्त करने और किसानों को भूमि का पुनर्वितरण करने के लिए भूमि सुधार कानून लाए गए। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों ने इन सुधारों को लागू करने के लिए जमींदारी उन्मूलन अधिनियम पारित किए।
हालांकि, जमींदारों (भूमि मालिकों) ने इन कानूनों को न्यायालयों में ,यह तर्क देते हुए चुनौती दी, कि उनसे संविधान के भाग III के अधीन विहित संपत्ति के मूल अधिकार का उल्लंघन होता है। पटना उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि बिहार भूमि सुधार अधिनियम असंवैधानिक था, जबकि इलाहाबाद और नागपुर उच्च न्यायालयों ने अपने-अपने राज्यों में इसी तरह के कानूनों को बरकरार रखा।
इन कानूनी विवादों को सुलझाने के लिए, केंद्र सरकार ने पहला संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1951 पेश किया, जिसमें भूमि सुधार कानूनों को न्यायिक पुनर्विलोकन से बचाने के लिए अनुच्छेद 31क और 31ख जोड़े गए। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि संशोधन ने मूल अधिकारों को कम किया, अनुच्छेद 13(2) का उल्लंघन किया, और अनंतिम संसद के पास अनुच्छेद 368 के अधीन इसे अधिनियमित करने का अधिकार नहीं था।

अवधारणीय प्रश्न

न्यायालय ने संवैधानिक संशोधनों के संबंध में कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को विरचित किया :

  1. क्या प्रथम, संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 संवैधानिक था?
  2. क्या अनंतिम संसद अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान में संशोधन कर सकती थी?
  3. क्या अनुच्छेद 13(2) संसद को मूल अधिकार को संशोधित करने से रोकता है?
  4. क्या अनुच्छेद 31क और 31ख भूमि कानूनों पर उनके प्रभाव के कारण अमान्य थे?
  5. क्या राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 368 को अपनाकर अनुच्छेद 392 के अधीन अपनी शक्तियों का अतिक्रमण किया?

सर्वोच्च न्यायालय का विश्लेषण और निर्णय

संविधान में संशोधन करने का संसद का अधिकार

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद को अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने का पूर्ण अधिकार है, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हैं। न्यायालय ने पुष्टि की कि प्रथम संविधान (संशोधन)अधिनियम, 1951 वैध और संवैधानिक था। न्यायालय ने नोट किया कि अनुच्छेद 368 में एक स्पष्ट संशोधन प्रक्रिया शामिल है जिसके लिए दोनों सदनों में पारित होना आवश्यक है।

अनुच्छेद 13(2) संशोधनों को प्रतिबंधित नहीं करता है

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 13(2) उन कानूनों को प्रतिबंधित करता है जो संशोधनों सहित मौलिक अधिकारों को कम करते हैं। न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया। न्यायालय ने सामान्य विधायी कानूनों और संवैधानिक संशोधनों के बीच अंतर करते हुए, निर्णय दिया कि अअनुच्छेद 13(2) केवल संसद की विधायी शक्ति के प्रयोग में बनाए गई सामान्य विधियों पर लागू होता है, अनुच्छेद 368 के अधीन किए गए संवैधानिक संशोधनों पर नहीं। इसलिए, पहला संशोधन अधिनियम असंवैधानिक नहीं था, भले ही इससे मूल अधिकारों पर अंकुश लगा हो।

अनुच्छेद 31ए और 31बी की वैधता

न्यायालय ने अनुच्छेद 31ए और 31बी को बरकरार रखा, यह निर्णय देते हुए कि उन्हें अनुच्छेद 368 के प्रावधान के अधीन विशेष अनुसमर्थन की आवश्यकता नहीं थी और वे वैध संशोधन थे, क्योंकि वे अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालयों की शक्तियों या अनुच्छेद 132 और 136 के अधीन सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों में परिवर्तन नहीं करते हैं। इसके सिवाय, उन्होंने मात्र कुछ मामलों को संविधान के भाग III के क्षेत्र से बाहर रखा ।

अनंतिम संसद का अधिकार और राष्ट्रपति के अनुकूलन

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अनंतिम संसद के पास संशोधन शक्तियों का अभाव है और राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 368 का अनुकूलन अवैध है। न्यायालय ने इससे असहमति जताते हुए निर्णय सुनाया कि अनुच्छेद 379 में “इस संविधान के प्रावधानों द्वारा संसद को प्रदान की गई सभी शक्तियां” शब्द इतने व्यापक हैं कि उनमें अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान में संशोधन करने की शक्ति भी शामिल है। यह तथ्य कि अनंतिम संसद में एक ही सदन है, संविधान में संशोधन करने के उसके अधिकार को सीमित नहीं करता।
न्यायालय ने संविधान (कठिनाइयों को दूर करना) आदेश संख्या 2 की वैधता को बरकरार रखा, जिसे राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 392 के अधीन जारी किया था। न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 392 राष्ट्रपति को अनंतिम संसद के अनुरूप अनुच्छेद 368 को संशोधित करने सहित कठिनाइयों को दूर करने के लिए संविधान के प्रावधानों को अनुकूलित करने की अनुमति देता है।

पीठ की संरचना

इस मामले का निर्णय पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने दिया, जो निम्नलिखित से मिलकर गठित हुई :

  • मुख्य न्यायाधीश हीरालाल कनिया
  • न्यायमूर्ति एम. पतंजलि शास्त्री (निर्णय के लेखक)
  • न्यायमूर्ति बी.के. मुखर्जी
  • न्यायमूर्ति सुधी रंजन दास
  • न्यायमूर्ति एन. चंद्रशेखर अय्यर

याद रखने योग्य बातें :

  • संसद अनुच्छेद 368 के अधीन मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती है।
  • अनुच्छेद 13(2) संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति को सीमित नहीं करता है।
  • संविधान संशोधन विधि अनुच्छेद 13 के अधीन विधि में शामिल नहीं है ।
  • अनुच्छेद 31ए और 31बी वैध हैं, जो भूमि सुधार कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाते हैं।
  • अनंतिम संसद के पास अनुच्छेद 379 के तहत पूर्ण संशोधन अधिकार था।
  • राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 392 के तहत अनुच्छेद 368 को कानूनी रूप से अपनाया।

उद्धरण और संदर्भ

निर्णय का शीर्षक: श्री शंकरी प्रसाद सिंह देव बनाम भारत संघ और बिहार राज्य
उद्धरण: 1951 एससीआर 89
निर्णय की तिथि: 5 अक्टूबर, 1951
पीठ: मुख्य न्यायाधीश हीरालाल कनिया के नेतृत्व में पांच न्यायाधीशों की पीठ

निष्कर्ष

“सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय संविधान के विकास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि संविधान संशोधन प्रक्रिया मूल अधिकारों को प्रभावित कर सकती है, और यह अनुच्छेद 13(2) केअधीन बाधित नहीं होती। यह मामला भविष्य में कई संवैधानिक विवादों की नींव बना, जिसमें गोलकनाथ (1967) और केशवानंद भारती (1973) जैसे ऐतिहासिक मामले शामिल हैं।

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