doctrine of waiver in hindi | अधित्याग का सिद्धांत
इस लेख मे संविधान के अंतर्गत आने वाले एक बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्धांत पर चर्चा करने वाले है, जिसे अधित्याग का सिद्धांत अर्थात doctrine of waiver कहते हैं ।
अधित्याग का सिद्धांत अर्थात doctrine of waiver भारतीय संविधान के अनुच्छेद मे निहित है. इस पर चर्चा करने से पहले अधित्याग का अर्थ क्या है इस पर बात कर लेते हैं।
अधित्याग का सिद्धांत का अर्थ meaning of doctrine of waiver:
“सामान्य शब्दों में अधित्याग का अर्थ “किसी अधिकार या दावे का त्याग करना अर्थात छोड़ देने से है । “
ब्लैक लॉ शब्दकोश के अनुसार –
“ एक ज्ञात अधिकार का साशय या स्वैच्छिक त्याग है। अधित्याग तब होता है, जब कोई व्यक्ति आश्यपूर्वक तथा पूर्ण ज्ञान के साथ अपने अधिकार के प्रयोग करने का अधिकार छोड़ देता है या उस अधिकार का प्रयोग न करने का विकल्प चुनता है, जो उस व्यक्ति के पास होता। एक अधिकार छोड़ने अर्थात त्यागने से तात्पर्य है कि कोई व्यक्ति अब उस अधिकार का दावा नहीं कर सकता है और उस कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने से रोका जाता है, जिसके लाभ के लिए अधिकार का त्याग किया जाता है। “
अधित्याग का सिद्धांत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 में निहित है, इसके अनुसार–
“ कोई भी व्यक्ति संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का स्वेच्छा से त्याग नहीं कर सकता है।”
यानी कि संविधान के भाग III में जितने भी मूल अधिकार दिए हुए हैं उनका त्याग नहीं किया जा सकता है । भारतीय संविधान में निम्नलिखित मूल अधिकार प्रदत्त किए गए है-
- समता का अधिकार ( Right to equality)अनुच्छेद 14 से 18
- स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom) अनुच्छेद 19 से 22
- शोषण के विरुद्ध अधिकार अनुच्छेद 23 व 24
- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25 से 28
- संस्कृति व शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 29 व 30
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार अनुच्छेद 32 से 35
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कोई भी व्यक्ति यह नहीं सकता कि उनके खिलाफ कोई कार्यवाही संस्थित की जाए या ऐसा नहीं कह सकता कि राज्य उनके साथ भेदभाव का बर्ताव कर सकता है।
जैसे कि कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि उसे जीने का अधिकार नहीं चाहिए या उसके साथ में जेंडर डिस्क्रिमिनेशन किया जाए।
क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 14 इस बात को वर्जित करता है।
अधित्याग के सिद्धांत के महत्वपूर्ण वाद
इससे संबंधित एक महत्वपूर्ण वाद निम्न हैं –
बेहराम खुर्शीद बनाम मुंबई राज्य AIR 1955 SC 146
‘इस वाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मूल अधिकार केवल व्यक्तिगत हित के लिए नहीं बल्कि लोक नीति के आधार पर साधारण जनता के हित के लिए संविधान में समाविष्ट किए गए हैं इसलिए कोई भी व्यक्ति अपने मूल अधिकारों को स्वेच्छा से नहीं त्याग सकता।’
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इस पर एक बहुत इंटरेस्टिंग केस है–
बिशेसर नाथ बनाम इनकम टैक्स कमिश्नर AIR1959 SC 149
‘इस केस में अपीलार्थी के विरुद्ध आयकर अधिनियम की धारा 5(1) के अंतर्गत नियुक्त एक आयकर जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह बताया कि अपीलार्थी ने एक बहुत बड़ी रकम छुपाई और उसने आयकर नहीं चुकाया।
तब अपीलार्थी ने सन् 1954 में आयकर और ₹300000 जुर्माना किश्तों में चुकाने का आयकर अधिकारियों से समझौता किया। । सुप्रीम कोर्ट ने आयकर अधिनियम की धारा 5 (1) को अनुच्छेद 14 के अंतर्गत असंवैधानिक घोषित कर दिया, तब अपीलार्थी ने समझौते के अधीन रकम के संबंध में आपत्ति उठाई।
आयकर विभाग का यह तर्क था कि अपीलार्थी ने समझौता कर अनुच्छेद 14 के अंतर्गत अपने मूल अधिकारों को स्वेच्छा से त्याग दिया था। अब वह उसके लिए कोई दावा नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह निर्णय लिया गया कि कोई भी नागरिक संविधान द्वारा प्रदत मूल अधिकारों को नहीं त्याग सकता क्योंकि यह व्यक्तिगत अधिकार नहीं है बल्कि लोकनीति के रूप में पूरे समाज के लिए संविधान में समाविष्ट किए गए हैं, यह संविधान द्वारा राज्य पर अधिरोपित कर्तव्य है और कोई भी व्यक्ति ऐसे कर्तव्य से राज्य को मुक्त नहीं कर सकता।
भारत की अधिकांश जनता गरीब अशिक्षित है और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति चेतना का अभाव है ऐसी स्थिति में राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों के अधिकारों की संरक्षा करें।
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निष्कर्ष के रूप मे यही कहा जा सकता है कि कोई भी व्यक्ति संवविधान द्वारा प्राप्त अपने संवैधानिक और मूल अधिकार को छोड़ नहीं सकता है भले ही वह अन्य विधिक अधिकारों का त्याग कर दे । क्यों कि मूल अधिकार लोकनीति पर आधारित होते हैं और इनकी सुरक्षा का दायित्व राज्य पर अधिरोपित किया गया है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को अधिकार बिल्कुल प्राप्त नहीं है की वह राज्य को उसके कर्तव्य से विमुक्त करे।
लेख पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न : अधित्याग के सिद्धांत से आप क्या समझते हो विभिन्न न्याय दृष्टांतों के माध्यम से समझाइए ?