शनिवार, मार्च 1, 2025
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doctrine of territorial nexus | doctrine of territorial nexus in hindi | क्षेत्रिक संबंध का सिद्धांत

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doctrine of territorial nexus | doctrine of territorial nexus in hindi | क्षेत्रिक संबंध का सिद्धांत

भारत में विधि बनाने का कार्य संसद और राज्य विधान मण्डल को प्राप्त है । विधि बनाने की यह शक्ति संसद और राज्य विधान मण्डल को शक्तियों के वितरण के आधार पर संविधान द्वारा प्राप्त हैं। भारत में संघात्मक संविधान को अपनाया गया है, जिसकी एक प्रमुख विशेषता केंद्र व राज्यों के मध्य शक्तियों के वितरण की होती है । संविधान के भाग 11 के अध्याय 1 में केंद्र व राज्य के बीच विधायी शक्तियों के वितरण के संबंध में प्रावधान किए गए हैं ।

संविधान में केंद्र व राज्य के बीच विधायी शक्तियों के वितरण निम्न आधार पर किया गया है –

  • विषय वस्तु
  • क्षेत्रीय / प्रादेशिक

विषय वस्तु संबंधी अधिकार क्षेत्र :

अनुच्छेद 246 उन विषयों को बताता है जिन पर संसद और राज्य विधान-मण्डल विधि बनाते है। इसके अनुसार संसद सातवीं अनुसूची की सूची 1 संघ सूची में वर्णित 97 विषयों तथा सूची 3 – समवर्ती सूची के 47 विषयों पर विधि निर्माण करने का अधिकार है । वहीं राज्य विधान मण्डल को भी समवर्ती सूची के 47 विषयों पर विधि निर्माण के साथ सूची 2 राज्य सूची के विषयों पर विधि बनाने का अधिकार है ।

क्षेत्रीय / प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र :

संसद और राज्य विधान मण्डल को विधि बनाने का प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र के संबंध में अनुच्छेद 245 में प्रावधान किया गया है। इस अनुच्छेद के खंड 1 में संसद सम्पूर्ण भारत के राज्यक्षेत्र लिए या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकती है, वहीं राज्य के विधान मण्डल अपने सम्पूर्ण राज्य या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकता है। संसद और राज्य विधान मण्डल की यही शक्ति क्षेत्रीय / प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र कहलाता है। दूसरे शब्दों में कहे तो संसद व राज्य विधान-मण्डल विधियों का निर्माण कर उन्हें केवल अपने राज्यक्षेत्र के भीतर प्रवर्तित करा सकता है ।

लेकिन इस अनुच्छेद के खंड 2 में कहा गया कि संसद द्वरा बनाई गई कोई भी विधि राज्यक्षेत्रातीत प्रवर्तन का आधार पर अविधिमान्य नहीं समझी जाएगी । अर्थात संसद की विधि का प्रवर्तन उसके अधिकार क्षेत्र से परे बाह्य-क्षेत्रीय प्रवर्तन भी किया जा सकता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो संसद ऐसी विधि बना सकता है जिनका राज्यक्षेत्रातीत प्रवर्तन होता है।

जैसा की ऊपर देखा कि संसद व राज्य विधान मण्डल को अपनी -अपनी क्षेत्रीय / प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र में कानून बनाकर लागू करने की अधिकारिता है। लेकिन संसद को अनुच्छेद 245 के खंड 2 के अधीन अपने द्वारा निर्मित कानूनों को क्षेत्रीय / प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र से पर अर्थात Extra-territorial  (बाह्य-क्षेत्रीय) लागू करवाना वैध है।

उदाहरण: राकेश और रजनी दोनों भारत से बाहर पेरिस में निवास करते हैं, राकेश अपनी पत्नी से तलाक लेना चाहता है, तो वह हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के अधीन शासित होंगे ।  


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इस संबंध में ए.एच. वाडिया बनाम आयकर आयुक्त बॉम्बे, एआईआर 1949 एफसी 181 के

मामले में यह माना गया था कि किसी प्रभुतासंपन्न विधायी प्राधिकरण द्वारा बनाई गई किसी विधि को किसी देशीय न्यायालय में इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है कि वह भारत राज्यक्षेत्र के बाहर भी लागू होती है। यह अंतरराष्ट्रीय कानून के नियमों का पालन नहीं कर सकता है या इसे लागू करते समय व्यावहारिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं, किन्तु ये सब नीति के प्रश्न हैं जिन पर देश के न्यायालयों में विचार नहीं किया जा सकता है।

सरल शब्दों में कहे तो सर्वोच्च विधायी प्राधिकारी द्वारा बनाई गई विधि का राज्यक्षेत्रातीत प्रवर्तन होता है, तब उसे उसके ऐसे प्रवर्तन की वैधता के आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जा सकता है ।

क्षेत्रिक संबंध का सिद्धांत doctrine of territorial nexus :

जैसा की संसद को अपने राज्यक्षेत्र में विधि बनाने के साथ-साथ प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र से परे  अर्थात Extra-territorial  (बाह्य-क्षेत्रीय) राज्यक्षेत्रातीत प्रवर्तित कराने की शक्ति है । राज्य विधान मण्डल को अपने क्षेत्रीय / प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र में विधि बनाकर लागू करने की अधिकारिता है। इस नियम का एक अपवाद है जिसे क्षेत्रिक संबंध / प्रादेशिक संबंध का सिद्धांत (doctrine of territorial nexus) के नाम से जानते है।

इसके अनुसार “यदि राज्य विधान मण्डल द्वारा बनाई गई विधि की विषय वस्तु और राज्य के बीच वास्तविक संबंध है, तब उसका प्रवर्तन क्षेत्रीय / प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र से बाहर किया जा सकेगा । यानी राज्य से बाहर लागू की जा सकती है।“ यही क्षेत्रिक संबंध का सिद्धांत (doctrine of territorial nexus) कहलाता है।

क्षेत्रिक संबंध के सिद्धांत की आवश्यक शर्ते (essential condition of doctrine of territorial nexus) :

क्षेत्रिक संबंध का सिद्धांत तभी लागू होगा अर्थात किसी विधि का राज्यक्षेत्रातीत प्रवर्तन निम्नलिखित शर्तों के पूर्ण होने पर ही किया जा सकता है _

 (1) विषय-वस्तु में और उस राज्य में वास्तविक सम्बन्ध हो; और

(2) दायित्व जो लगाया है उस राज्यक्षेत्र से सम्बन्ध होना चाहिये।

उक्त शर्तों के पूर्ण होने पर ही राज्यक्षेत्रातीत प्रवर्तन् को वैध माना जाएगा । यही बात

ए.एच. वाडिया बनाम आयकर आयुक्त बॉम्बे, एआईआर 1949 एफसी 181

यह मामला आयकर का मामला था जिसमे यह अभिनिर्धारित  किया गया था, कि कर लगाने वाला कानून इस आधार पर आक्षेपित नहीं किया जा सकता है कि यह अतिरिक्त क्षेत्रीय/ राज्यक्षेत्रातीत है, यदि कोई व्यक्ति जो कर के दायित्व के अधीन है और वह देश जो उस कर को लगाता है, के बीच कोई संबंध है। हालाँकि, संबंध वास्तविक होना चाहिए और लगाए जाने वाले दायित्व को उस संबंध  के लिए प्रासंगिक होना चाहिए।


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महत्वपूर्ण निर्णय

 वालेस बनाम इन्कम टैक्स कमिश्नर, बम्बई [एआईआर 1948 पीसी 118] 1

के मामले में एक ब्रिटिश कम्पनी एक भारतीय फर्म में भागीदार थी। भारतीय आयकर अधिकारियों ने कम्पनी की समस्त आय पर आयकर लगाया। प्रिवी कौंसिल ने क्षेत्रिक सम्बन्ध के सिद्धान्त के आधार पर कर को विधिमान्य घोषित किया और कहा कि चूंकि कम्पनी की अधिकांशतः आय भारत-के राज्यक्षेत्र से आती थी, अंत; भारत से उसका यह सम्बन्ध उसे भारत में ही स्थित मानने के लिए पर्याप्त था।

बॉम्बे राज्य बनाम आर.एम.डी.सी. [एआईआर 1957 एससी 699] 1

के मामले में एक अधिनियम के अधीन बम्बई राज्य को लाटरी और इनामी विज्ञापनों पर कर लगाने की शक्ति प्राप्त थी। यह कर उस समाचार पत्र पर भी लगाया या जो बंगलौर से प्रकाशित होता था किन्तु बम्बई राज्य में उसका प्रसारण था। प्रत्यर्थी इस समाचार-पत्र के इनामी लाटरी चलाता था। न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि समाचार-पत्र पर कर लगाने के लिए उचित क्षेत्रिक सम्बन्ध विद्यमान था। इस मामले में दो बातें आवश्यक हैं-

(1) विषय-वस्तु में और उस राज्य में जो स पर करलगाना चाहता है, वास्तविक सम्बन्ध हो, भ्रामक सम्बन्ध नहीं; और

(2) दायित्व जो लगाया है उसे सम्बन्ध के प्रसंगानुकूल होना चाहिये।

यह प्रश्न कि किसी मामले में पर्याप्त सम्बन्ध है या नहीं, यह वाद के तथ्यों के आधार पर निर्धारित किया जायेगा।


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 टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड बनाम बिहार राज्य, एआईआर 1958 एससी 4522

यह मामला बिहार राज्य द्वारा टाटा आयरन कंपनी के माल के विक्रय कर लगने का था जिसका विक्रय राज्य से बाहर होता था।  एक राज्य केवल माल की विक्रय पर कर लगा सकता है। इसके पास बाह्य क्षेत्रीय रूप से कर लगाने की कोई शक्ति नहीं है, इसलिए यह केवल राज्य में होने वाली विक्रय पर ही कर लगा सकता है। बड़े सम्मान के साथ मुझे लगता है कि माल या उन तत्वों को देखना गलत है जो विक्रय  का गठन करते हैं, क्योंकि कर की शक्ति ‘विक्रय’ तक ही सीमित है और कर माल पर या विक्रय के समझौते पर या कीमत के रूप पर नहीं है, लेकिन केवल’ विक्रय  पर है  इसलिए, जब तक कि विक्रय स्वयं राज्य में न हो, तब तक राज्य कर नहीं लगा सकता।

श्रीकांत भालचंद्र करुलकर और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य, 1994 एससीसी 52

इस मामले में अपीलार्थियों ने गुजरात एग्रीकल्चरल लैण्ड सीलिंग एक्ट, 1960 की धारा 6 (3-क) की विधिमान्यता को इस आधार पर चुनौती दिया कि इसका प्रभाव राज्य क्षेत्रातीत (extra-territorial) था अतः अनु० 245 के अधीन राज्य विधान मण्डल की विधायी शक्ति के बाहर है। अपीलार्थीगण गुजरात राज्य में कुछ खेती योग्य भूमि के स्वामी थे। उनकी कुछ भूमियाँ राज्य क्षेत्र के बाहर भारत के अन्य भागों भी थीं। उक्त धारा यह उपबन्ध करती थी कि भूमि की अधिकतम सीमा के प्रयोजन के लिए उनकी राज्य से बाहर स्थित भूमि को भी सम्मिलित किया जायेगा। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि राज्य विधान मण्डल क्षेत्रिक सम्बन्ध के सिद्धान्त के आधार पर उक्त विधि बनाने के लिए सक्षम था क्योंकि भूमियों का राज्य से अभिन्न सम्बन्ध था।

राज्य (एनसीटी ऑफ दिल्ली) बनाम बृजेश सिंह उर्फ ​​अरुण कुमार व अन्य, 2017 एससी2

इस मामले में, यह परीक्षण के लिए पर्याप्त है कि क्या उत्तर प्रदेश राज्य और दिल्ली के एनसीटी राज्य के सक्षम न्यायालयों में दायर चार्जशीट के बीच एक क्षेत्रीय संबंध है, जहां प्रत्यर्थीयों पर मुकदमा चलाया जा रहा है। यदि संबंध पर्याप्त रूप से स्थापित है, तो मकोका के अधीन प्रत्यर्थीयों के अभियोजन को अतिरिक्त(बाह्य) क्षेत्रीयता के आधार पर अमान्य नहीं कहा जा सकता है।

निष्कर्ष (conclusion):

अंत में, क्षेत्रीय / प्रादेशिक संबंध का सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे के भीतर अधिकार क्षेत्र के सिद्धांतों और सीमाओं को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी राज्य के क्षेत्र और उसके क्षेत्राधिकार के बीच सीधा संबंध स्थापित करके, यह सिद्धांत राज्य के कानूनों और विनियमों के प्रवर्तन का निर्धारण करने में एक मौलिक सिद्धांत के रूप में कार्य करता है।

क्षेत्रिक/प्रादेशिक संबंध का सिद्धांत यह मानता है कि एक राज्य की संप्रभुता अपने क्षेत्र तक फैली हुई है, तथा अपनी सीमाओं के भीतर के व्यक्तियों, वस्तुओं और होने वाली घटनाओं पर अधिकार का प्रयोग करने में सक्षम बनाती है। यह न्यायिक क्षमता स्थापित करने के लिए आधार बनाता है, राज्यों को अपने कानूनों को लागू करने और अपने क्षेत्र के भीतर अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम बनाता है।

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लेख पर आधारित प्रश्न : क्षेत्रिक संबंध का सिद्धांत क्या हैं ? महत्वपूर्ण निर्णयों के माध्यम से समझाइए?

References

1 भारत का संविधान जे एन पांडे

2 escr.gov.in

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