Doctrine of severability in hindi | पृथक्करणीयता का सिद्धांत
पृथक्करणीयता का सिद्धांत
जब किसी अधिनियम का कोई भाग या उपबंध संविधान से असंगत अर्थात असंवैधानिक होता है, तब प्रश्न उठता है कि उस पूरे अधिनियम को शून्य घोषित कर दिया जाए या केवल उसके उसी भाग को अवैध घोषित कर दिया जाए जो संविधान के उपबंधो से असंगत है ? ऐसे मामलों के निपटारे के लिए उच्चतम न्यायालय ने पृथक्करणीयता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
इस सिद्धांत के अनुसार “यदि किसी अधिनियम का अवैध भाग उसके शेष भाग से विधानमंडल के आशय अर्थात अधिनियम के मूल उद्देश्य को समाप्त किए बिना प्रथक किया जा सकता है तो केवल मूल अधिकारों से असंगत वाला भाग ही अवैध घोषित किया जाएगा पूरे अधिनियम को नहीं।” यही प्रथक्करणीयता का सिद्धांत कहलाता है ।
संविधान के अनुच्छेद 13 के खंड 1 में प्रयुक्त वाक्यांश “ऐसी असंगति की सीमा तक” और खंड 2 में प्रयुक्त वाक्यांश “उल्लंघन की सीमा तक” से विधानमंडल का यह आशय स्पष्ट होता है, कि मूल अधिकारों से असंगत या उनका उल्लंघन करने वाली (to the extent of inconsistency or contravention) संविधान पूर्व विधि या संविधानोत्तर विधि के केवल वही भाग अवैध घोषित किए जाए, जो मूल अधिकारों से असंगत हों या उनका उल्लंघन करते हो, संपूर्ण विधि को अवैध घोषित करने की आवश्यकता नहीं है।
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पृथक्करणीयता सिद्धांत के उदाहरण या निर्णय
ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य ए.आई.आर. 1950 एस.सी.27
इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने निवारक निरोध अधिनियम 1950 की धारा 14 की विधिमान्यता को चुनौती दी गई थी जिसके द्वारा किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की विधिमान्यता की जांच करने की न्यायालय की शक्ति ले ली गई थी तब उच्चतम न्यायालय ने धारा 14 को असंवैधानिक घोषित कर दिया और कहा कि इस धारा को अलग कर देने से उसकी प्रकृति, संरचना या उद्देश्य में कोई परिवर्तन नहीं होगा। इसका तात्पर्य धारा 14 को अवैध घोषित कर देने से अधिनियम के शेष भाग की विधिमान्यता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
इसी प्रकार बम्बई राज्य बनाम बालसारा AIR 1951 SC 318
प्रस्तुत वाद में उच्चतम न्यायालय ने मुंबई प्रांत के मध्य निषेध अधिनियम, 1949 के केवल कुछ उपबंधो को असंवैधानिक घोषित कर दिया और शेष अधिनियम वैध बना रहा था।
अपवाद
इसका एक अपवाद यह भी है कि यदि वैध भाग अवैध भाग से इस प्रकार अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है कि अवैध भाग को निकाल देने से अधिनियम का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा या शेष भाग का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रह जाएगा तब न्यायालय पूरे अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य AIR 1950 SC 124
इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि “जहां कि विधि का आशय मूल अधिकारों पर निर्बन्धन लगाने का प्राधिकार देना है और वह ऐसी व्यापक भाषा में है जो संविधान द्वारा विहित सीमाओं के अंदर और बाहर दोनों प्रकार के निर्बंधनो में आती हैं और जहां दोनों को पृथक करना संभव नहीं है वहा पूरे अधिनियम को ही अवैध घोषित कर दिया जाएगा। जब तक कि ऐसे प्रयोजनों के लिए जो कि संविधान द्वारा अनुमोदित नहीं है, इसके लागू होने की संभावना को दूर नहीं कर दिया जाता तब तक उस विधि को पूर्णत: असंवैधानिक एवं शून्य घोषित किया जाना आवश्यक है।”
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किहोतो होलोहान बनाम जाचिलू AIR 1993 SC 412
प्रस्तुत मामले में संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा सात को दलबदल अधिनियम द्वारा असंवैधानिक घोषित कर दिया किंतु माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा यह निर्णय दिया गया कि उसे निकाल देने से पूरे अधिनियम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह विधिमान्य बना रहेगा।
लेख पर आधारित प्रश्न :
प्रथक्करणीयता के सिद्धांत क्या हैं, न्यायिक निर्णय देते हुए समझाइए ?
FAQ
प्रथक्करणीयता का सिद्धांत अनुच्छेद 13 मे विहित है
आईपीसी की धारा 497, आईटी ऐक्ट 2000 की धारा 66 A