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राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001
(2003 का अधिनियम संख्या 1)
राजस्थान राज्य में के कतिपय परिसरों से बेदखल करने, उनको किराये पर देने तथा उनके किराये को नियंत्रित करने और उनसे आनुषंगिक विषयों के लिए अधिनियम ।
भारत गणराज्य के बावनवें वर्ष में, राजस्थान राज्य विधानमण्डल निम्नलिखित अधिनियम बनाता है :-
अध्याय 1 प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, प्रसार और प्रारम्भ. — (1) इस अधिनियम का नाम राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 है।
(2) इसका प्रसार प्रथमतः ऐसे नगरपालिक क्षेत्रों में, जिनमें राज्य में के जिला मुख्यालय हैं और तत्पश्चात् ऐसे अन्य नगरपालिका क्षेत्रों में होगा जिन्हें राज्य सरकार राज पत्र में अधिसूचना द्वारा समय- समय पर विनिर्दिष्ट करे ।
(3) यह ऐसी तारीख से प्रवृत्त होगा जो राज्य सरकार, राज-पत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे।
2. परिभाषाएं. – इस अधिनियम में, जब तक विषय या संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) “सुख-सुविधाएं” के अन्तर्गत, जल और विद्युत का प्रदाय, आवागमन के रास्ते, सीढियाँ, प्राकृतिक प्रकाश, शौचालय, लिफ्ट, सफाई, स्वच्छता सेवाएं, टेलीफोन सेवाएँ, टी.वी. केबल सेवाएं ऐसी ही सेवाएं हैं;
(ख) “अपील किराया अधिकरण” से धारा 19 के अधीन गठित अपील किराया अधिकरण अभिप्रेत है;
(ग) “भू-स्वामी” से ऐसा कोई भी व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी परिसर का किराया, चाहे अपने लेखे या किसी अन्य व्यक्ति के अभिकर्ता, न्यासी, संरक्षक या (रिसीवर के रूप में तत्समय प्राप्त कर रहा है या प्राप्त करने का हकदार है या जो परिसर के किसी किरायेदार को किराये पर दिये जाने की दशा में, उसका किराया इस प्रकार प्राप्त करेगा या प्राप्त करने का हकदार होगा;
(घ) “पट्टा” से संपत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 (1882 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 4) के अधीन यथापरिभाषित पट्टा अभिप्रेत है;
(ङ) “नगरपालिक क्षेत्र” से राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 1[2009 (2009 का अधिनियम सं. 18)] के अधीन यथापरिभाषित नगरपालिक क्षेत्र अभिप्रेत है ।
(च) “परिसर” से निम्नलिखित अभिप्रेत है:-
(क) ऐसी कोई भूमि जो कृषि प्रयोजनों के लिए उपयोग में नहीं ली जाती है; और
(ख) (फार्म भवन से भिन्न) ऐसा कोई भवन या भवन का भाग जो निवास के रूप में उपयोग के लिए या वाणिज्यिक उपयोग या किसी अन्य प्रयोजन के लिए किराये पर दिया गया हो या किराये पर दिये जाने के लिए आशयित हो, और उसमें निम्नलिखित भी सम्मिलित हैं ;-
(i) ऐसे भवन या भाग से अनुलग्न उद्यान, भूमि, गोदाम, गैराज तथा उपगृह, यदि कोई हों,
(ii) ऐसे भवन या भाग में उपयोग के लिए भू स्वामी द्वारा दिया गया कोई फर्नीचर,
(iii) ऐसे भवन या भाग में उसके अधिक फायदाप्रद उपभोग के लिए उससे लगी हुई कोई फिटिंग और उसमें उपलब्ध करवायी गयी सुख-सुविधाएं, और
(iv) ऐसे किसी भवन या भाग से अनुलग्न तथा उसके साथ किराये पर दी हुई भूमि,
किन्तु उसमें किसी होटल, धर्मशाला, पथिकाश्रम, सराय, बासा, बोर्डिंग हाउस या प्र छात्रावास में कोई कमरा अथवा अन्य वास सुविधा सम्मिलित नहीं है;
स्पष्टीकरण. किसी प्रतिकूल संविदा के अभाव में छत का ऊपरी भाग किसी किरायेदार को किराये पर दिये गये परिसर का भाग नहीं होगा;
(चक) “किराया प्राधिकारी” से धारा 22-क अधीन नियुक्त अधिकारी अभिप्रेत है ।
(छ) “किराया अधिकरण” से धारा 13 के अधीन गठित किराया अधिकरण अभिप्रेत है;
(ज) “वरिष्ठ नागरिक” से भारत का कोई ऐसा- नागरिक अभिप्रेत है जिसने पैंसठ वर्ष या अधिक की आयु प्राप्त कर ली हो;
(झ) “किरायेदार” से अभिप्रेत है,-
(i) वह व्यक्ति जिसके द्वारा या जिसके लेखे या जिसकी ओर से किसी परिसर के लिए उसके भू स्वामी को किराया अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा के न होने पर संदेय है या संदेय होता और उसमें वह व्यक्ति भी सम्मिलित है जो अपनी किरायेदारी की समाप्ति के पश्चात् भी, इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन पारित बेदखली के किसी आदेश या डिक्री से अन्यथा कब्जा बनाये रखता हो; और
(ii) उपखण्ड (i) में निर्दिष्ट व्यक्ति की मृत्यु हो जाने की दशा में;
(क) निवासीय प्रयोजनों के लिए किराये पर दिये गये परिसर की दशा में, उसका उत्तरजीवी पति या पत्नी, पुत्र, पुत्री, माता-पिता जो उसकी मृत्यु तक ऐसे परिसर में उसके कुटुम्ब के सदस्य के रूप में साधारणतया निवास कर रहा था;
(ख) वाणिज्यिक या कारबार सम्बन्धी प्रयोजनों के लिए किराये पर दिये गये परिसर की दशा में, उसका उत्तरजीवी पति या पत्नी, पुत्र, पुत्री, माता-पिता जो उसकी मृत्यु तक ऐसे परिसर में उसके कुटुम्ब के सदस्य के रूप में साधारणतया कारबार कर रहा था; और
(ञ) “अधिकरण” से अपील किराया अधिकरण या, यथास्थित, किराया अधिकरण अभिप्रेत है।
3. [Sec. 3 अध्याय 2 और 3] का कतिपय परिसरों और किरायेदारियों को लागू न होना.- इस अधिनियम के अध्याय 2 और 3 में अंतर्विष्ट कोई भी बात निम्नलिखित को लागू नहीं होगी :–
(i) to (iii) repealed
(iv) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण के या उनके द्वारा किराये पर दिये गये परिसरों को ;
(v) किसी केन्द्रीय अधिनियम या राजस्थान अधि नियम द्वारा गठित किसी भी निगमित निकाय के या उसके द्वारा किराये पर दिये गये किन्हीं परिसरों को;
(vi) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित किसी सरकारी कम्पनी के किन्हीं परिसरों को;
(vii) राज्य के देवस्थान विभाग के किन्हीं भी परिसरों को जिनका प्रबन्ध और नियन्त्रण राज्य सरकार द्वारा किया जाता है, या वक्फ अधिनियम 1995 (1995 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 43) के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी भी वक्फ की किसी भी सम्पत्ति को;
(viii) किन्हीं ऐसे परिसरों को, जो किसी ऐसे धार्मिक, पूर्त या शैक्षाणिक न्यास के या ऐसे न्यासों के वर्ग के हो, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा, राज-पत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट किया जाये;
(ix) किन्हीं भी ऐसे परिसरों को, जो तत्समय प्रवृत्त किसी भी विधि द्वारा स्थापित किसी के हों या उसमें निहित हों;
(x) किन्हीं भी ऐसे परिसरों को जो बैंकों, या किसी केन्द्रीय या राज्य अधिनियम के द्वारा या अधीन स्थापित किसी भी पब्लिक सेक्टर उपक्रम या किसी भी निगम को या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को और एक करोड़ रुपये या उससे अधिक की समादत्त शेयर पूंजी वाली प्राइवेट लिमिटेड कम्पनियों या पब्लिक लिमिटेड कम्पनियों को, किराये पर दिये गये हों; स्पष्टीकरण. इस खण्ड के प्रयोजन के लिए अभिव्यक्ति बैक से अभिप्रेत है,-
(i) भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक;
(ii) भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैक) अधिनियम, 1959 (1959 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 38) में यथापरिभाषित कोई समनुषंगी बैंक;
(iii) बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 5) की धारा 3 के अधीन या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980
(1980 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 40 ) की धारा 3 के अधीन गठित कोई तत्स्थानी नया बैंक;
(iv) कोई भी अन्य बैंक जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 2) की धारा 2 के खण्ड (ङ) में यथापरिभाषित अनुसूचित बैंक हो; और
(xi) ऐसे किन्हीं परिसरों को जिन्हें किसी विदेशी नागरिक या किसी विदेशी राज्य के राजदूतावास, उच्चायोग, दूतावास या किसी अन्य निकाय को या ऐसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठन को, जिसे राज्य सरकार द्वारा राज-पत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाये, किराये पर दिया गया हो।
4.किराये का तय किये गये रूप में होना.- किन्हीं भी परिसरों के लिए संदेय किराया, इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अध्यधीन उतना ही होगा, जितना भू-स्वामी और किरायेदार के बीच आपस में तय किया जाये और उसमें सुख – सुविधाओं के लिए संदेय ऐसे प्रभार सम्मिलित नहीं होंगे जो पृथक्तः तय किये जायें और जो तदनुसार संदेय होंगे।
5. किरायेदार द्वारा किराये का संदाय और विप्रेषण. – (1) जब तक कि अन्यथा तय न हो, प्रत्येक किरायेदार जिस मास का किराया संदेय है, उसके अगले मास के पन्द्रहवें दिन तक किराया संदत्त करेगा।
(2) प्रत्येक किरायेदार, जो किराये के लेखे कोई in संदाय करता है, संदत्त रकम की भू-स्वामी या उसके सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता द्वारा सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित रसीद अभिप्राप्त करने का हकदार होगा ।
(3) कोई किरायेदार भू-स्वामी या उसके सम्यक् रूप से प्राधिकृत अभिकर्ता को निम्नलिखित में से किसी भी रीति से संदाय कर सकेगा :-
(क) व्यक्तिगत संदाय द्वारा, नकद द्वारा, चैक या बैंक ड्राफ्ट द्वारा, या
(ख) उस बैंक खाते में संदाय द्वारा, जो भू-स्वामी द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाये, या
(ग) डाक धनादेश द्वारा विप्रेषित करके ।
(4) भू-स्वामी किरायेदार को उसी नगरपालिका क्षेत्र में का अपना बैंक खाता संख्यांक और बैंक का नाम, किराये के करार में या रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा उसे प्रेषित नोटिस के माध्यम से बतायेगा ।
अध्याय 2 किराये का पुनरीक्षण
6. विद्यमान किरायेदारियों के सम्बन्ध में किराये का पुनरीक्षण . – ( 1 ) किसी करार में अन्तर्विष्ट किसी बात
के होते हुए भी, जहां परिसर इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व किराये पर दिये गये हों वहाँ उनका किराया नीचे
उपदर्शित फारमूले के अनुसार पुनरीक्षणीय होगा :
(क) जहाँ परिसर 1 जनवरी, 1950 के पूर्व किराये पर दिये गये हों उन्हें 1 जनवरी, 1950 को किराये पर दिया हुआ
समझा जायेगा और उस समय संदेय किराया [5 प्रतिशत] प्रति वर्ष की दर से बढाये जाने का दायी होगा और किराये की
बढोतरी की रकम दस वर्ष के पश्चात् ऐसे किराये में समाविष्ट कर दी जायेगी। इस प्रकार परिनिर्धारित की गयी किराये की
रकम इस अधिनियम के प्रारंभ होने के वर्ष तक [5 प्रतिशत ] प्रतिवर्ष की दर से उसी रीति से जाने की दायी होगी;
(ख) जहाँ परिसर 1 जनवरी, 1950 को या उसके पश्चात् किराये पर दिये गये हों वहाँ किरायेदारी के प्रारम्भ के समय संदेय किराया [5 प्रतिशत] प्रतिवर्ष की की दर से बढाये जाने का दायी होगा और किराये की बढोतरी की रकम दस वर्ष के पश्चात् ऐसे किराये में समाविष्ट कर दी जायेगी। इस प्रकार परिनिर्धारित की गयी किराये की रकम इस अधिनियम के प्रारंभ होने के वर्ष तक [5 प्रतिशत] प्रतिवर्ष की दर से उसी रीति से पुन: बढाये जाने की दायी होगा;
(2) उपधारा (1) में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी जहाँ उप-धारा (1) के अधीन किराये की बढोत्तरी के समाविष्ट किये जाने की दस वर्ष की कालावधि इस अधिनियम का प्रारम्भ होने का वर्ष तक पूर्ण नहीं होती है तो [5 प्रतिशत] प्रतिवर्ष की दर से किराया इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के वर्ष तक बढाया जायेगा और किराये में बढोत्तरी की रकम किराये में समाविष्ट की जायेगी।
(3) उप-धारा (1) और (2) में दिये गये फारमूले के अनुसार परिनिर्धारित किराया इस अधिनियम के प्रारंभ के
वर्ष से प्रत्येक वर्ष के पूर्ण होने के पश्चात् [5 प्रतिशत] प्रतिवर्ष की दर से पुन: बढाये जाने और किराये की बढोत्तरी की रकम दस वर्ष पश्चात् किराये में समाविष्ट कर दी जायेगी। ऐसा किराया किरायेदारी रहने तक उसी दर से और
बढाये जाने का और उसी रीति से समाविष्ट किये जाने का दायी होगा।
(4) उप-धारा (1) या उप-धारा (2) में दिये गये फारमूले के अनुसार पुनरीक्षित किराया, इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् भू-स्वामी और किरायेदार के बीच तय हुई तारीख से, या जहाँ किसी किराया अधिकरण में कोई भी अर्जी फाइलं की गयी हो वहाँ ऐसी अर्जी फाइल किये जाने की तारीख से, संदेय होगा।
7. नयी किरायेदारियों के संबंध में किराये का पुनरीक्षण. — (1) किसी प्रतिकूल करार के अभाव में, इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् किराये पर दिये गये परिसरों का किराया 5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढाये जाने का दायी होगा और किराये की बढोतरी की रकम दस वर्ष के पश्चात् ऐसे किराये में समाविष्ट कर दी जायेगी। ऐसा किराया किरायेदारी रहने तक आगे उसी दर से बढाये जाने का और उसी रीति से समाविष्ट किये जाने का दायी होगा।
(2) 5 प्रतिशत प्रतिवर्ष से अधिक किराये की बढोत्तरी का कोई भी करार उस सीमा तक शून्य होगा।
अध्याय 3 किरायेदारी
8. सीमित कालावधि की किरायेदारी. — (1) कोई भू-स्वामी परिसरों को निवासीय प्रयोजनों के लिए तीन वर्ष से अनधिक की सीमित कालावधि के लिए किराये पर दे सकेगा।
(2) ऐसे मामलों में भू-स्वामी और प्रस्थापित किरायेदार सीमित कालावधि की किरायेदारी करने की अनुज्ञा के लिए और कब्जे की पुनः प्राप्ति का प्रमाण पत्र देने के लिए किराया अधिकरण के समक्ष एक संयुक्त अर्जी प्रस्तुत करेंगे।
(3) किराया अधिकरण तुरन्त अनुज्ञा प्रदान करेगा और ऐसे परिसरों के कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए प्रमाणपत्र में उल्लिखित कालावधि के अवसान पर निष्पादित प्रमाण पत्र जारी करेगा। तथापि, ऐसी अनुज्ञा उन्हीं परिसरों के लिए तीन बार से अधिक नहीं दी जायेगी :
परन्तु; इस धारा में जारी कब्जे की पुनः प्राप्ति का 5 प्रमाण पत्र व्यपगत हो जायेगा यदि अधिकरण के समक्ष उसके निष्पादन के लिए अर्जी ऐसे प्रमाण पत्र के निष्पादनीय होने की तारीख से छह मास के भीतर-भीतर दाखिल नहीं की गयी हो ।
9. किरायेदारों की बेदखली. – किसी अन्य विधि या. संविदा में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, किराया अधिकरण किरायेदार की बेदखली का आदेश तब तक नहीं देगा जब तक कि उसका यह समाधान न हो जाये कि,
(क) किरायेदार ने उससे शोध्य चार मास के किराये की रकम न तो संदत्त की है, न निविदत्त की है;
परन्तु; इस खण्ड अधीन भू-स्वामी को यह आधार उपलब्ध नहीं होगा यदि उसने किरायेदार को उसी नगरपालिक क्षेत्र में का अपना बैंक खांता संख्यांक और बैंक का नाम, किराये के करार में या रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा उसको प्रेषित नोटिस के माध्यम से, न बताया हो;
परन्तु; यह और कि इस खण्ड के अधीन के आधार पर कोई भी अर्जी तब तक फाइल नहीं की जायेगी तब तक कि भू-स्वामी ने किराये की बकाया की मांग हेतु किरायेदारों को रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा नोटिस न दे दिया हो और किरायेदार ने नोटिस की तामील के तीस दिन की कालावधि के भीतर-भीतर किराये की बकाया का संदाय नहीं कर दिया हो;
स्पष्टीकरण; इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए. किराया निविदत्त किया हुआ तभी माना जायेगा जब वह भू- स्वामी को समुचित रूप से संबोधित करते हुए धनादेश के जरिये विप्रेषित कर दिया गया हो या किराया प्राधिकारी को जमा करा दिया गया हो, या
(ख) किरायेदार ने परिसर को जान बूझकर सारवान नुकसान कारित किया है या कारित करने के लिए अनुज्ञात किया है; या
(ग) किरायेदार ने भू-स्वामी को लिखित अनुज्ञा के बिना कोई भी ऐसा संनिर्माण किया है या करने के लिए अनुज्ञात किया है जिसने परिसर को सारवान् रूप से परिवर्तित कर दिया है या जिससे उसका मूल्य कम होने की संम्भावना है; या
(घ) किरायेदार ने ऐसा कोई न्यूसेंस पैदा किया है या ऐसा कोई कार्य किया है जो उस प्रयोजन से असंगत है
जिसके लिए उस परिसर को किराये पर दिया गया था या जिसके कारण भू-स्वामी के हित पर प्रतिकूलतः
और सारत: प्रभाव पडने की संभावना है; या
(ङ) किरायेदार ने भू-स्वामी की लिखित अनुशा के बिना सम्पूर्ण परिसर या उसके भाग का कब्जा सौंप दिया है, उप-किराये पर दे दिया है या अन्यथा त्याग दिया है;
स्पष्टीकरण; यदि यह सिद्ध हो जाता है कि सम्पूर्ण परिसर या उसका भाग किरायेदार से भिन किसी व्यक्ति के अनन्य
कब्जे में है तो यह उपधारणा की जायेगी कि किरायेदार ने सम्पूर्ण परिसर या. यथास्थिति, उसके भाग को या तो उप-
किराये पर दे दिया है या उसका कब्जा त्याग दिया है; या
(च) किरायेदार ने उस रूप में अपनी हैसियत का अधित्याग कर दिया है या उसने भू-स्वामी के हक से इन्कार कर दिया है और भू-स्वामी ने अपने अधिकार का अधित्यजन नहीं किया है या किरायेदार के आचरण को माफ नहीं किया है; या
(छ) परिसरों को निवासीय प्रयोजनों के लिए किराये पर दिया गया था किन्तु पूर्णतः या अंशत: वाणिजियक उपयोग में लिया गया है; या
(ज) परिसर, किरायेदार को उसके भू-स्वामी की सेवा या नियोजन में होने के कारण निवासीय प्रयोजनों के लिए किराये पर दिया गया था और किरायेदार ऐसी सेवा या नियोजन में नहीं रहा है; या
(झ) परिसर, भू-स्वामी के स्वयं के या उसके कुटुम्ब के उपयोग या अधिभोग के लिए या किसी भी ऐसे व्यक्ति के, जिसके फायदे के लिए परिसर धारित है, उपयोग या अधिभोग के लिए, युक्तियुक्त रूप से और होगी सद्भाविक रूप से अपेक्षित है;
परन्तु; जहाँ भू-स्वामी द्वारा, किसी भी परिसर से बेदखली की डिक्री खण्डे (झ) के अधीन चाही गयी है वहाँ उसे उस परिसर की तीन वर्ष की कालावधि के भीतर-भीतर, किसी भी अन्य व्यक्ति को किराये पर देने से प्रतिषिद्ध किया जायेगा और यदि परिसर किराये पर दे दिया जाता है तो किरायेदार किराया अधिकरण के समक्ष अर्जी प्रस्तुत करके कब्जे के प्रत्यावर्तन का हकदार होगा और किराया अधिकरण ऐसी अर्जी को शीघ्रता से निपटायेगा और धारा 16 में यथा-अधिकथित प्रक्रिया यथावश्यक परिवर्तनों सहित लागू होगी; या
(ञ) किरायेदार ने अपनी आवश्यकता के लिए पर्याप्त उपयुक्त परिसर बना लिया है या उसका खाली कब्जा अर्जित कर लिया है या उसे आवंटित कर दिया गया है; या
(ट) परिसरों का उपयोग, जिस प्रयोजन के लिए वे किराये पर दिये गये थे उसके लिए युक्तियुक्त कारण के बिना अर्जी की तारीख से ठीक पूर्व की छह मास की निरन्तर कालावधिं के लिए नहीं किया गया है; या
(ठ) किसी भी प्राधिकारी द्वारा भू-स्वामी से किसी भी विधि के अधीन परिसर में की भीड़-भाड़ कम किये जाने की अपेक्षा की गयी है; या
(ड) भू-स्वामी को निम्नलिखित कोई भी निर्माण कार्य करवाने के लिए परिसर की आवश्यकता है, –
(i) किसी सुधार स्कीम या विकास स्कीम के अनुसरण में राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण के अनुरोध पर ; या
(ii) क्योंकि परिसर मानव निवास के लिए असुरक्षित या अनुपयुक्त हो गया है।
10. कतिपय मामलों में तुरन्त कब्जा पुनः प्राप्त करने का भू-स्वामी का अधिकार – इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी भी विधि में या किसी भी संविदा या प्रथा में अंतर्विष्ट किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी,
(i) कोई भू-स्वामी किराया अधिकरण में इस निमित्त कोई अर्जी फाइल किये जाने पर किसी निवासीय परिसर का तुरन्त कब्जा पुनः प्राप्त करने का हकदार होगा, यदि वह, –
(क) संघ के किसी भी शस्त्र बल या अर्द्धसैनिक बल का सदस्य है या था और पूर्वोक्त अर्जी, सेवानिवृत्ति, निर्मुक्ति या, यथास्थिति, सेवोन्मुक्ति की तारीख के पूर्व या उसके पश्चात् एक वर्ष के भीतर भीतर, या इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से एक वर्ष की कालावधि के भीतर-भीतर, इनमें से जो भी बाद में हो, फाइल कर दी गयी हो;
(ख) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या स्थानीय निकाय या राज्य के स्वामित्व वाले निगमों का कोई कर्मचारी है या था और पूर्वोक्त अर्जी उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख के पूर्व या उसके पश्चात् एक वर्ष की कालावधि के भीतर-भीतर, या इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से एक वर्ष की कालावधि के भीतर- भीतर इनमें से जो भी बाद में हो, फाइल कर दे;
(ग) वरिष्ठ नागरिक हो गया है और परिसर को किराए पर देने की तारीख से तीन वर्ष के अवसान के पश्चात् पूर्वोक्त अर्जी फाइल कर दे;
(ii) किसी ऐसे भू-स्वामी का, जो संघ के किन्हीं भी सशस्त्र बलों या अर्द्धसैनिक बलों का कोई सदस्यथा और अपने नियोजन के दौरान मर गया है, (कोई आश्रित विधिक प्रतिनिधि, किराया अधिकरण मे इस निमित्त अर्जी फाइल किये जाने पर, निवासीय परिसर का तुरन्त कब्जा पुनः प्राप्त करने का हकदार होगा, यदि अर्जी उसके द्वारा ऐसे सदस्य की मृत्यु के
पश्चात् एक वर्ष की कालावधि के भीतर-भीतर, या इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से एक वर्ष की कालावधि के भीतर-भीतर इनमें से जो भी बाद में हो, फाइल कर दी जाये;
(iii) भू-स्वामी की मृत्यु के पश्चात् उसकी विधवा) किराया अधिकरण में इस निमित्त किसी अर्जी के फाइल किये जाने पर, निवासीय परिसर का तुरन्त कब्जा पुनः प्राप्त करने का हकदार होगी यदि अर्जी उसके द्वारा उसके पति की मृत्यु की तारीख से एक वर्ष की कालावधि के भीतर-भीतर फाइल कर दी जाये ।
(2) जहाँ भू-स्वामी ने एक से अधिक परिसर किराये पर दे खरे हों वहाँ उप-धारा (1) के अधीन अर्जी भू-स्वामी द्वारा चुने जाने वाले किराये पर दिये गये एक परिसर के संबंध में ही चलने योग्य होगी और उप-धारा (1) के अधीन अर्जी तब ही चलने योग्य होगी जब अर्जीदार उसी नगरपालिका क्षेत्र में के अपने स्वयं के परिसर में निवास नहीं कर रहा हो ।
(3) जहाँ कोई भू-स्वामी, भूतल पर के अपने परिसर को किराये पर देने के पश्चात् किसी ऐसी स्थायी नि:शक्तता से ग्रस्त हो गया हो जिसके कारण वह सीढियों का उपयोग करने में असमर्थ हो और अपने स्वयं के निवास के लिए भूतल परिसर की उसे आवश्यकता हो वहाँ वह, किराया अधिकरण में इस निमित्त अर्जी फाइल किये जाने पर, ऐसी किसी स्थायी निःशक्तता के बारे में किसी सरकारी अस्पताल के सम्यक् रूप से गठित चिकित्सा बोर्ड से कोई प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने पर और किराया अधिकरण का यह समाधान कर देने पर कि उसी नगरपालिक क्षेत्र में उसके कब्जे में भूतल पर का उसका अपना कोई उपयुक्त निवासीय परिसर नहीं है, ऐसे भूतल पर के परिसर का तुरन्त कब्जा पुनः प्राप्त करने का हकदार होगा।
परन्तु; यदि किरायेदार भ-स्वामी के अधिभोग में के ऊपरी मंजिल के परिसर के बदले में भूतल का परिसर खाली करने के लिए तैयार है तो किराया अधिकरण भू-स्वामी के पक्ष में तुरन्त कब्जे का आदेश केवल इस शर्त पर पारित करेगा कि भू स्वामी ऊपरी मंजिल के उसके अधिभोग में के परिसर का आनुपातिक रूप से बराबर भाग किरायेदार को, ऐसे निर्बंधनों और शर्तों पर, जो , किराया अधिकरण द्वारा नियत की जायें, उपलब्ध करवायेगा ।
(4) जहाँ भू-स्वामी ने इस धारा के अधीन परिसर का कब्जा पुनः प्राप्त कर लिया है वहाँ तीन वर्ष की कालावधि के भीतर किसी अन्य व्यक्ति को उस परिसर को किराये पर देने से प्रतिषिद्ध होगा और यदि वह परिसर किराये पर दिया जाता है तो किरायेदार उसके द्वारा किराया अधिकरण के समक्ष किये गये आवेदन पर कब्जे के प्रत्यावर्तन का हकदार होगा और किराया अधिकरण ऐसे आवेदन को शीघ्रता से निपटायेगा और धारा 16 में अधिकथित प्रक्रिया यथावश्यक परिवर्तनों सहित लागू होगी।
स्पष्टीकरण. इस धारा के प्रयोजन के लिए अभिव्यक्ति “भू-स्वामी से निवासीय परिसर का स्वामी अभिप्रेत होगा ।
अध्याय – 4 अवैध रूप से बेदखल किये गये किरायेदार के कब्जे का प्रत्यावर्तन और उसकी प्रक्रिया
11. अवैध रूप से बेकब्जाकृत किरायेदार के कब्जे का प्रत्यावर्तन. – यदि किसी किरायेदार को विधि की सम्यक् प्रक्रिया से अन्यथा उसकी सहमति के बिना भू-स्वामी द्वारा किराये के परिसर से बेकब्जा किया जाता है तो वह, ऐसे बेकब्जा किये जाने की जानकारी होने की तारीख से तीस दिन के भीतर-भीतर, उसके कब्जे के प्रत्यावर्तन के लिए किराया अधिकरण के समक्ष अर्जी फाइल कर सकेगा।
12. कब्जे की पुन: प्राप्ति की प्रक्रिया. — (1) इस अधिनियम की धारा 11 के अधीन कब्जे की पुनः प्राप्ति का दावा करने वाला किरायेदार या कोई भी व्यक्ति किराया अधिकरण के समक्ष अर्जी फाइल करेगा। ऐसी अर्जी के साथ ऐसे शपथपत्र और दस्तावेजों की प्रतियों के साथ नोटिस, भू-स्वामी शपथ-पत्रों और दस्तावेजों, यदि कोई हों, जिनका कब्जा पुन: प्राप्त करने के लिए हक किरायेदार या व्यक्ति अवलंब लेना चाहते है, संलग्न होंगे ।
(2) किराया अधिकरण, उप धारा (1) के अधीन अर्जी फाइल किए जाने पर अर्जी, शपथ पत्रों और दस्तावेजों की प्रतियों के साथ नोटिस भू – स्वामी से शपथ -पत्रों और दस्तावेजों , यदि कोई हो जिन पर भू-स्वामी निर्भर करता है, के साथ जवाब प्रस्तुत करने की अपेक्षा करते हुए ऐसी कोई तारीख नियत करते हुए, जारी करेगा जो नोटिस तामीलं किये जाने की तारीख से इक्कीस दिन पश्चात् की न हो ।
नोटिस की तामील अधिकरण या सिविल न्यायायलय के आदेशिका तामीलकर्ता द्वारा ही रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा की जायेगी। इनमें से किसी भी रीति से सम्यक् रूप से की गयी तामील पर्याप्त तामील मानी जायेगी।
(3) भू-स्वामी, अपना जवाब, शपथ-पत्र और दस्तावेज, अर्जीदार पर उनकी प्रतियों की तामील करने के
पश्चात्, नोटिस की तामील से दस दिन से अनधिक की कालावधि के भीतर-भीतर प्रस्तुत कर सकेगा।
अर्जीदार जवाब की तामील की तारीख से सात दिन की कालावधि के भीतर-भीतर प्रत्युत्तर, यदि कोई हो, भू-
स्वामी पर उसकी प्रति की तामील करने के पश्चात् फाइल कर सकेगा। तत्पश्चात् किराया अधिकरण
सुनवाई की ऐसी तारीख नियम करेगा जो प्रत्युत्तर फाइल किये जाने के लिये नियत की गयी तारीख से पन्द्रह
दिन के अपश्चात् की होगी। अर्जी का निपटारा भू-स्वामी पर नोटिस की तामील की तारीख से नब्बे दिन की
कालावधि के भीतर-भीतर किया जायेगा ।
(4) किराया अधिकरण ऐसी संक्षिप्त जाँच करने के पश्चात् जो वह यह अवधारित करने के लिए आवश्यक
समझे कि क्या अर्जीदार को विधि की सम्यक् प्रक्रिया से अन्यथा उसकी सहमति के बिना किराये के परिसर
से अवैध रूप से बेकब्जा किया गया है, ऐसी परिसर का कब्जा किरायेदार को तुरंत प्रत्यावर्तन आदेश करतेहुए अर्जी का निपटारा करेगा। अधिकरण किरायेदार को, मामले के तथ्यों व परिस्थितियों दृष्टिगत रखते हुए
उसे हुई कठिनाई और असुविधा के लिए, पर्याप्त प्रतिकर भी दे सकेगा जो भू-स्वामी द्वारा संदेय होगा और
अधिकरण तुरंत कब्जे की पुन: प्राप्ति के लिए प्रमाण-पत्र जारी करेगा ।
अध्याय 5 अधिकरण का गठन, किराये के पुनरीक्षण और बेदखली की प्रक्रिया, अपील और निष्पादन
13. किराया अधिकरण का गठन.- (1) राज्य सरकार ऐसी संख्या में और ऐसे स्थानों पर, किराया अधिकरणों का राज-पत्र में अधिसूचना द्वारा गठन करेगी जो उसके द्वारा आवश्यक समझे जायें।
(2) जहाँ किसी भी क्षेत्र के लिए दो या उससे अधिक किराया अधिकरण गठित किये जायें वहाँ राज्य सरकार, साधारण या विशेष आदेश से, उनके बीच कार्य के वितरण को विनियमित कर सकेगी।
(3) किसी किराया अधिकरण में उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त किया जाने वाला केवल एक जिसे इसमें आगे पीठासीन अधिकारी कहा गया है, होगा ।
(4) कोई भी व्यक्ति किराया अधिकरण का पीठासीन अधिकारी नियुक्त होने को पात्र तभी होगा जब वह राजस्थान न्यायिक सेवा का सदस्य होते हुए सिविल न्यायाधीश (वरिष्ठ खण्ड) से नीचे की पंक्ति का नहीं होगा ।
(5) उप-धारा (3) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी उच्च न्यायालय किसी एक किराया अधिकरण के पीठासीन अधिकारी को दूसरे किराया अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के कृत्यों के निर्वहन के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगा।
14. किराये के पुनरीक्षण के लिए प्रक्रिया.- (1) भू-स्वामी किराया अधिकरण के समक्ष शपथपत्र और दस्तावेज, यदि कोई हों, के साथ अर्जी प्रस्तुत करके धारा 6 या धारा 7 के अधीन किराये के पुनरीक्षण की याचना कर सकेगा।
(2) ऐसी अर्जी फाइल किये जाने पर किराया अधिकरण, अर्जी शपथपत्रों और दस्तावेजों की कोई तारीख नियत करते हुए जारी करेगा, जो नोटिस जारी किये जाने की तारीख से तीस दिन के पश्चात् की न हो। विरोधी पक्षकार नोटिस की तामिल की तारीख से तीस दिन से अनधिक की कालावधि के भीतर-भीतर जवाब, शपथपत्र और दस्तावेज, उनकी प्रतियों की अर्जीदार पर तामील करने के पश्चात् फाइल कर सकेगा। नोटिस की तामील (अधिकरण या सिविल न्यायालय के आदेशिका तामीलकर्ता द्वारा साथ ही रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा की जायेगी। इनमें से किसी भी रीति से नोटिस की सम्यक् रूप से की गयी तामील पर्याप्त तामील मानी जायेगी।
(3) तत्पश्चात् अर्जीदार प्रत्युत्तर यदि कोई हो, विरोधी पक्षकार को उसकी प्रति की तामील करने पश्चात् जवाब की तामील की तारीख से पन्द्रह दिन से अनधिक की कालावधि के भीतर-भीतर फाइल कर सकेगा।
(4) तत्पश्चात् किराया अधिकरण सुनवाई की ऐसी तारीख नियत करेगा जो किरायेदार को नोटिस की तामील की तारीख से नब्बे दिन के पश्चात् की नहीं होगी।
(5) किराया अधिकरण, ऐसी सुनवाई के दौरान ऐसी संक्षिप्त जाँच, जो वह आवश्यक समझे, कर सकेगा और धारा 6 या धारा 7 में अधिकथित फारमूले के अनुसार किराया नियत कर सकेगा और वह तारीख उपदर्शित करते हुए, जिससे ऐसा किराया संदेय होगा, वसूली प्रमाण-पत्र जारी कर सकेगा। अर्जी का निपटारा, किरायेदार को नोटिस की तामील की तारीख से एक सौ पचास दिन के भीतर भीतर किया जायेगा ।
15. किरायेदार की बेदखली के लिए प्रक्रिया. – (1) कब्जे का दावा करने वाला भू-स्वामी या कोई अन्य व्यक्ति किराया अधिकरण के समक्ष अर्जी फाइल करेगा और ऐसी अर्जी के साथ शपथपत्र और दस्तावेज, यदि कोई हो, जिनका कब्जे का दावा करने वाला भू-स्वामी या व्यक्ति अवलम्ब लेना चाहता है, संलग्न होंगे।
(2) किराया अधिकरण, उप-धारा (1) के अधीन अर्जी के फाइल किये जाने पर अर्जी, शपथपत्र और दस्तावेज, यदि कोई हों, की प्रतियों के साथ नोटिस, , किरायेदार से शपथपत्रों और दस्तावेजों, यदि कोई हों, जिन पर किरायेदार निर्भर करता है, के साथ जवाब प्रस्तुत करने की अपेक्षा करते हुए, ऐसी कोई तारीख नियत करते हुए जारी करेगा जो नोटिस के जारी किये जाने की तारीख से तीस दिन के पश्चात् की न हो। नोटिस की तामील अधिकरण या सिविल न्यायालय के आदेशिका तामीलकर्ता द्वारा साथ ही रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा की जायेगी। इनमें से किसी भी रीति से सम्यक् रूप से की गयी तामील पर्याप्त तामील मानी जायेगी ।
(3) किरायेदार अपना जवाब, शपथ-पत्र और दस्तावेज, अर्जीदार को उनकी प्रतियों की तामील करने के पश्चात् नोटिस की तामील की तारीख से पैंतालीस दिन से अनधिक की कालावधि के भीतर भीतर, प्रस्तुत कर सकेगा ।
(4) तत्पश्चात् अर्जीदार प्रत्युत्तर, यदि कोई हो, विरोधी पक्षकार को उसकी प्रति की तामील करने के पश्चात् जवाब की तामील की तारीख से तीस दिन की कालावधि के भीतर-भीतर फाइल कर सकेगा।
(5) तत्पश्चात् किराया अधिकरण सुनवाई की ऐसी – तारीख नियत करेगा, जो किरायेदार को नोटिस की तामील की
तारीख से एक सौ अस्सी दिन के पश्चात् र्की नहीं होगी। अर्जी का निपटारा, किरायेदार को नोटिस की तामील की तारीख
से दो सौ चालीस दिन की कालावधि के भीतर-भीतर किया जायेगा।
(6) किराया अधिकरण, ऐसी सुनवाई के दौरान 2 ऐसी संक्षिप्त जाँच, जो वह आवश्यक समझे, कर सकेगा और अर्जी का विनिश्चय कर सकेगा। किराया अधिकरण पक्षकारों के बीच विवाद के सुलह या समझौते के लिए भी प्रयास कर सकेगा ।
(7) जहाँ किराया अधिकरण अर्जी का विनिश्चय भू 1 स्वामी के पक्ष में करता है वहाँ वह किरायेदार के कब्जे की पुन: प्राप्ति के लिए एक प्रमाण-पत्र जारी करेगा।
(8) उप-धारा (7) के अधीन जारी किया गया प्रमाण-पत्र विनिश्चय की तारीख से तीन मास की कालावधि तक निष्पादनीय नहीं होगा
परन्तु; यह कि यदि परिसर वाणिज्यिक प्रयोजन के लिये किराये पर दिया गया है तो ऐसा प्रमाण-पत्र विनिश्चय की तारीख से छः माह तक के लिये निष्पादनीय नहीं होगा ।
16. तुरन्त कब्जे की पुनः प्राप्ति की प्रक्रिया. – (1) तुरन्त कब्जा चाहने वाला भू-स्वामी या कोई भी व्यक्ति किराया अधिकरण के समक्ष अर्जी फाइल करेगा और ऐसी अर्जी के साथ ऐसे शपथपत्र और दस्तावेज संलग्न होंगे, जिनका तुरन्त कब्जा चाहने का हकदार भू-स्वामी या व्यक्ति अवलम्ब लेना चाहता है।
(2) किराया अधिकरण, उप-धारा (1) के अधीन अर्जी फाइल किये जाने पर अर्जी, शपथपत्रों और दस्तावेजों की प्रतियों के साथ नोटिस, किरायेदार से शपथपत्रों और दस्तावेजों, यदि कोई हों, जिन पर किरायेदार निर्भर करता है, के साथ जवाब प्रस्तुत करने की अपेक्षा करते हुए, ऐसी कोई तारीख नियत करते हुए जारी करेगा जो नोटिस तामील किये जाने की तारीख से तीस दिन के पश्चात् की न हो। नोटिस की तामील किये जाने की तारीख से तीस दिन के पश्चात् की न हो। नोटिस की तामील अधिकरण या सिविल न्यायालय के आदेशिका तामीलकर्ता द्वारा साथ ही रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा की जायेगी । इनमें से किसी भी रीति से सम्यक् रूप से की गयी तामील पर्याप्त तामील मानी जायेगी।
(3) किरायेदार, अपना जवाब, शपथपत्र और दस्तावेज, अर्जीदार को उनकी प्रतियों की तामील करने के पश्चात् नोटिस की तामील की तारीख से तीस दिन से अनधिक की कालावधि के भीतर-भीतर, प्रस्तुत कर सकेगा। अर्जीदार, प्रत्युत्तर, यदि कोई हो, किरायेदार को उसकी प्रतियों की तामील करने के पश्चात् जवाब की तामील की तारीख पन्द्रह दिन की कालावधि के भीतर-भीतर फाइल कर सकेगा।
(4) तत्पश्चात् किराया अधिकरण सुनवाई की ऐसी तारीख नियत करेगा जो किरायेदार को नोटिस की तामील की तारीख से नब्बे दिन के पश्चात् की नहीं होगी। अर्जी का निपटारा, किरायेदार को नोटिस की तामील की तारीख से एक सौ पचास दिन के भीतर भीतर किया जायेगा ।
(5) किराया अधिकरण ऐसी सुनवाई के दौरान ऐसी संक्षिप्त जांच, जो वह आवश्यक समझे, यह सुनिश्चित करने के लिए कर सकेगा कि क्या अर्जीदार धारा 10 की उप-धारा (1) या उप-धारा (3) के अधीन यथावर्गीकृत भू-स्वामी है और यह समाधान हो जाने पर कि अर्जीदार धारा 10 की उप धारा (1) या उप-धारा (3) के अधीन विनिर्दिष्ट भू-स्वामी के प्रवर्गों में से किसी प्रवर्ग का है, अर्जी का निपटारा, किरायेदार को नोटिस की तामील की तारीख से एक सौ बीस दिन की कालावधि के भीतर-भीतर करेगा और किरायेदार से तुरन्त कब्जे की पुन: प्राप्ति के लिए प्रमाण-पत्र जारी करेगा।
(6) उप-धारा (5) के अधीन जारी किया गया प्रमाण-पत्र विनिश्चय की तारीख से तीन मास की कालावधि तक निष्पादनीय नहीं होगा।
17. अपील किराया अधिकरण के समक्ष पक्षकारों की उपसंजाति के लिए तारीख नियत करना और अन्तिम आदेश की प्रतियों का दिया जाना.- किराया अधिकरण किसी अर्जी का, जिसमें वह किसी पक्षकार के विरुद्ध एकपक्षीय कार्यवाही नहीं कर रहा है, अंतिम विनिश्चय करते समय, ऐसे अपील किराया अधिकरण के समक्ष, जिसको उसके अंतिम आदेश की अपील होती है, अर्जी के पक्षकारों की उपसंजाति के लिए अपने विनिश्चय के दो माह पश्चात् की किन्तु छः माह के अपश्चात् की तारीख नियत करेगा और अर्जी के पक्षकार किराया अधिकरण के अंतिम आदेश के विरुद्ध फाइल की गयी अपील के, यदि कोई हो, नोटिस प्राप्त करने के लिए ऐसी तारीख को ऐसे अपील किराया अधिकरण के समक्ष उपसंजात होंगे। इस प्रकार नियत तारीख का, किराया अधिकरण द्वारा पारित किये गये अंतिम आदेश में, उल्लेख किया जायेगा। और अंतिम आदेश की प्रति उस आदेश को सुनाये जाने के तुरन्त पश्चात् ऐसे पक्षकार को दी जायेगी जिसके विरुद्ध वह किया गया है और यदि अंतिम आदेश भागतः एक पक्षकार के विरुद्ध हो और भागतः दूसरे पक्षकार के विरुद्ध होऔर दोनों पक्षकर अंतिम आदेश के विरुद्ध अपील कर सकेंगे, अंतिम आदेश की प्रति दोनों पक्षकारों को दी जायेगी। अंतिम आदेश की प्रति पर पीठासीन अधिकारी की मुद्रा के अधीन यह पृष्ठांकन होगा कि वह इस उपबंध के अधीन दी जा रही है और अपील करने वाला पक्षकार, अपनी अपील के साथ ऐसी प्रति फाइल कर सकेगा।
18. किराया अधिकरण की अधिकारिता. – (1) तत्समय प्रवृत्त किसी भी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उन क्षेत्रों में, जिनमें इस अधिनियम का प्रसार है, इन अधिनियम के उपबंधों के अधीन भू- स्वामी और किरायेदार के बीच के विवादों और उनसे संबद्ध तथा आनुषंगिक विषयों के संबंध में फाइल की गयी अर्जियों को सुनने और विनिश्चित करने की अधिकारिता केवल किराया अधिकरण को होगी न कि किसी भी सिविल न्यायालय को:
परन्तु; किराया अधिकरण ऐसी अर्जियों का, जिन पर इस अधिनियम के अध्याय 2 और 3 में अन्तर्विष्ट उपबंध लागू नहीं
होते हैं, विनिश्चय करते हुए, संपत्ति अनतरण अधिनियम, 1882 (1882 का अधिनियम सं. 4), भारतीय संविदा
अधिनियम, 1872 (1872 का अधिनियम सं. 9), या ऐसे मामले में लागू किसी भी अन्य सारवान् विधि के उपबंधों का
उसी रीति से, जिसमें यदि ऐसा विवाद किसी सिविल न्यायालय के समक्ष वाद के माध्यम से लाया गया होता तो ऐसी
विधि लागू की गयी होती, सम्यक् ध्यान रखेगा :
परन्तु; यह और कि इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई भी बात किराया अधिकरण को, ऐसी किसी अर्जी को, जिसमें भू-
स्वामी और किरायेदार के बीच कोई विवाद अंतर्वलित हो, ग्रहण करने के लिए . सशक्त करने वाली नहीं समझी जायेगी,
जिस पर t राजस्थान सरकारी स्थान (अप्राधिकृत अधिगियों 1 की बेदखली) अधिनियम, 1964 (1965 का ) अधिनियम
सं. 2) और राजस्थान परिसर (अधिग्रहण और बेदखली) अध्यादेश, 1949 के उपबंध लागू होते हैं।
(2) जहाँ अर्जी केवल असंदत्त किराये या किराये की बकाया की वसूली के लिए फाइल की जाती है वहाँ ऐसी अर्जी पर धारा 14 में प्रगणित समय अनुसूची और प्रक्रिया यथावश्यक परिवर्तनों सहित लागू होगी।
(3) जहाँ अर्जी ऐसे परिसरों और किरायेदारियों के संबंध में जिन पर इस अधिनियम के अध्याय 2 और 3 के उपबंध लागू नहीं होते, कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए फाइल की जाती है वहाँ ऐसी अर्जी पर धारा 15 में प्रगणित समय अनुसूची और प्रक्रिया यथावश्यक परिवर्तनों सहित लागू होगी।
(4) अर्जी, ऐसे किराया अधिकरण के समक्ष संस्थित की जायेगी जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर परिसर स्थित है।
19. अपील किराया अधिकरण, अपीलें और उनकी परिसीमा. – (1) राज्य सरकार ऐसी संख्या में और ऐसे स्थानों पर अपील किराया अधिकरणों का, राज-पत्र में अधिसूचना द्वारा, गठन करेगी जो उसके द्वारा आवश्यक समझे जायें।
(2) जहाँ किसी भी क्षेत्र के लिए दो या अधिक अपील किराया अधिकरण गठित किये जायें वहाँ राज्य सरकार, साधारण या विशेष आदेश से उनके बीच कार्य के वितरण को विनियमित कर सकेगी।
(3) किसी अपील किराया अधिकरण में, उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त किया जाने वाला केवल एक व्यक्ति (जिसे इसमें आगे अपील किराया अधिकरण – का पीठासीन अधिकारी कहा गया है) होगा।
(4) कोई भी व्यक्ति अपील किराया अधिकरण का पीठासीन अधिकारी नियुक्त होने का पात्र तभी होगा जब वह [जिला न्यायाधीश संवर्ग सेवा का सदस्य ] होते हुये ऐसे सदस्य के रूप में [तीन वर्ष] का अनुभव रखता हो।
(5) उप-धारा (3) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उच्च न्यायालय किसी अपील किराया अधिकरण के पीठासीन अधिकारी को दूसरे अपील किराय अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के कृत्यों के निर्वहन के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगा।
(6) किराया अधिकरण द्वारा पारित प्रत्येक अन्तिम आदेश की अपील ऐसे अपील किराया अधिकरण को हो सकेगी जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वह परिसर स्थित है और ऐसी कोई अपील अन्तिम आदेश की तारीख से (साठ दिन) की कालावधि के भीतर-भीतर ऐसे अन्तिम आदेश की प्रति के साथ फाइल की जायेगी ।
(7) अपील किराया अधिकरण, उप-धारा (6) के अधीन अपील फाइल किये जाने पर, किराया की अपील अधिकरण के समक्ष पक्षकारों की उपसंजाति के लिए साथ नोटिस तामील करेगा। यदि प्रत्यर्थी इस प्रकार दोनों हो अधिकरण द्वारा धारा 17 के अधीन अपील किराया नियत तारीख को प्रत्यर्थी पर अपील की प्रति के नियत तारीख को अपील किराया अधिकरण के समक्ष उपसंजात होने में विफल रहता है तो उसके विरुद्ध एकपक्षीय कार्यवाही की जा सकेगी। यदि धारा 17 के अधीन पारित अंतिम आदेश किसी पक्षकार के विरुद्ध एकपक्षीय कार्यवाहियों में पारित किया गया था तो अपील किराया अधिकरण, तीस दिन के अपश्चात् की तारीख नियत करते हुए, प्रत्यर्थी से अपने समक्ष इस प्रकार नियत तारीख को उपसंजात होने की अपेक्षा करते हुए, अपील की प्रति के साथ नोटिस जारी करेगा और ऐसे किसी नोटिस की तामील अपील अधिकरण या सिविल न्यायालय के आदेशिका तामीलकर्ता द्वारा साथ ही रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा की जायेगी और इनमें से किसी भी रीति से नोटिस की सम्यक् रूप से की गयी तामील पर्याप्त तामील मानी जायेगी। तथापि, जहाँ अपील किराया अधिकरण, मामले के तथ्यों को देखते हुए न्याय हित में अन्यथा ऐसा करना आवश्यक समझे वहाँ वह ऊपर उपदर्शित रीति से प्रत्यर्थी अपील का नोटिस जारी कर सकेगा ।
(8) तत्पश्चात् अपील किराया अधिकरण, सुनवाई की तारीख नियत करेगा जो प्रत्यर्थी पर अपील के नोटिस की तामील की तारीख से पैंतालिस दिन के पश्चात् की नहीं होगी और अपील का निपटारा, प्रत्यर्थी पर अपील के नोटिस की तामील की तारीख से एक सौ अस्सी दिन की कालावधि के भीतर भीतर किया जायेगा।
(9) जहाँ अपील किराया अधिकरण किसी न्यायसंगत और समुचित विनिश्चय पर पहुंचने के . हित में यह आवश्यक समझे, वहाँ वह अपील में कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर अतिरिक्त शपथपत्र या दस्तावेज फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा।
(10) अपील किराया अधिकरण (स्वविवेक) अपील के लम्बन के दौरान, ऐसा (अंतर्वर्ती आदेश) पारित कर सकेगा, जो वह उचित समझे।
(11) (क) अपील का विनिश्चय करते समय, अपील किराया अधिकरण, उसके लिए कारण • अभिलिखित
करने के पश्चात्,-
(i) किसी किराया अधिकरण द्वारा पारित आदेश को पुष्ट, परिवर्तित, अपास्त, उलट या उपांतरित कर सकेगा; या
(ii) यदि न्याय हित में आवश्यक हो तो ऐसे निदेश के साथ, जो वह उचित समझे, मामला किराया अधिकरण को प्रतिप्रेषित कर सकेगा।
(ख) अपील किराया अधिकरण उसके द्वारा दिये गये विनिश्चिय के अनुसार समुचित पुनः प्राप्ति प्रमाणपत्र
जारी करेगा ।
(ग) अपील किराया अधिकरण का विनिश्चिय अंतिम होगा और उसके आदेश के विरुद्ध कोई और अपील या
पुनरीक्षण नहीं हो सकेगा ।
(12) किसी भी पक्षकार के आवेदन पर और पक्षकारों को नोटिस के पश्चात् और उनकी सुनवाई के पश्चात् जो चाहते हैं कि उन्हें सुना जाये या ऐसे नोटिस के बिना स्वप्रेरणा से, अपील किराया अधिकरण किसी भी प्रक्रम पर निपटारे के लिए किसी भी मामले को एक किराया अधिकरण से किसी दूसरे किराया अधिकरण को अंतरिम कर सकेगा।
(13) जहाँ उप-धारा (12) के अधीन कोई मामला अंतरित किया गया है, वहाँ वह किराया अधिकरण, जिसे इसके पश्चात् ऐसे मामले का विचारण या निपटारा करना है, अंतरण के आदेश में किसी विशेष निदेश के अध्यधीन जिस प्रक्रम पर उसे अंतरित किया गया है, उसी से अग्रसर होगा।
स्पष्टीकरण; उप-धारा (6) में निर्दिष्ट अभिव्यक्ति अंतिम आदेश से वह आदेश अभिप्रेत है जिसके द्वारा किराया अधिकरण के समक्ष लम्बित किसी भी कार्यवाही का अंतिम रूप से निपटारा किया गया है।
19-क. अर्जी या अपील के लम्बित रहने के दौरान किराया और उसके बकाया के संदाय का आदेश देने की
अधिकरण की शक्ति. – अधिकरण, भू-स्वामी के आवेदन पर, अर्जी या, यथास्थिति, अपील पर पक्षकारों को
सुनने के पश्चात् आदेश देगा कि किरायेदार, भू-स्वामी को किराये के मद्दे समस्त देयताओं का तत्काल संदाय करेगा
और अर्जी या, यथास्थिति, अपील के लम्बित रहने के दौरान जब और जैसे ही यह देय हो,
किराये का संदाय जारी रखेगा ।
20. आदेशों का निष्पादन – (1) किराया-अधिकरण, किसी भी पक्षकार के आवेदन पर, विहित रीति से, इस अधिनियम के अधीन पारित किसी अंतिम आदेश या किसी भी अन्य आदेश का निष्पादन निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक रीतियों को अंगीकृत करके करेगा अर्थात् :-
(क) विरोधी पक्षकार की जंगम या स्थावर संपत्ति की कुर्की और विक्रय;
(ख) विरोधी पक्षकार की गिरफ्तारी और निरोध;
(ग) विरोधी पक्षकार के किसी भी एक या अधिक बैंक खातों की कुर्की और ऐसे खाते में से संदत्त की जाने वाली आदेश की रकम की तुष्टि;
(घ) किसी सरकारी कर्मचारी या किसी भी राष्ट्रीयकृत बैंक, स्थानीय प्राधिकारी, निगम, सरकारी कंपनी के कर्मचारी के वेतन और भत्ते की कुर्की:
(ङ) आदेश की निष्पादन के लिए किसी भी अधिवक्ता की ऐसे पारिश्रमिक पर जैसा नियत किया जा सके, कमिश्नर के रूप में नियुक्ति करके या अधिकरण या स्थानीय प्रशासन या स्थानीय निकाय के किसी भी अधिकारी को प्रतिनियुक्त करके;
(च) प्रार्थी को परिसर के कब्जे का प्रदाय ।
(2) अधिकरण इस अधिनियम के अधीन पारित अंतिम आदेश या अन्य आदेश के निष्पादन के क्रम में स्थानीय प्रशासन या स्थानीय निकाय या पुलिस की सहायता की अपेक्षा कर सकेगा।
(3) यदि किरायेदार कब्ज़े की पुनः प्राप्ति के प्रमाणपत्र के जारी होने की तारीख से तीन मास के भीतर- भीतर परिसर को खाली नहीं करता है तो वह कब्जे की पुनः प्राप्ति के प्रमाणपत्र के जारी होने की तारीख से, निवासीय प्रयोजनों के लिए किराये पर दिये गये परिसरों की दशा में किराये के 2 गुने की दर से, वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए किराये पर दिये गये परिसरों की दशा में किराये के 3 गने की दर से और धारा 16 के अधीन तुरंत कब्जे की पुनः प्राप्ति के प्रमाणपत्र जारी हो जाने की दशा में किराये के 3 गुने की दर से अंत:कालीन लाभों का संदाय करने का दायी होगा।
(4) किराया अधिकरण इस अधिनियम के अधीन पारित किसी अंतिम आदेश या किसी भी अन्य आदेश के संबंध में संक्षिप्त रीति से निष्पादन कार्यवाहियाँ संचालित करेगा और इस अधिनियम के अधीन निष्पादन के आवेदन का निपटारा विरोधी पक्षकार पर नोटिस तामील किये जाने की तारीख से पैंतालीस दिनों के भीतर- भीतर करेगा ।
स्पष्टीकरण; कब्जे या तुरंत कब्जे की पुनः प्राप्ति के प्रमाणपत्र के जारी किये जाने के आदेश के विरुद्ध कोई अपील या
अन्य कार्यवाही फाइल किये जाने से किरायेदार उप-धारा (3) के अधीन विनिर्दिष्ट दरों पर अंत:कालीन लाभ के संदाय के.
उसके दायित्व से नहीं बच सकेगा जब तक कि अपील किराया अधिकरण या ऐसे न्यायालय द्वारा, जिसके समक्ष ऐसा
आदेश आक्षेपित है, विनिर्दिष्ट रूप से अन्यथा आदेशित न हो और यदि पुनः प्राप्ति प्रमाणपत्र के जारी करने का आदेश
अंतिम रूप से बनाये रखा जाता है तो किरायेदार उस तारीख से, जिसको पुनः प्राप्ति प्रमाणपत्र प्रारंभ में जारी किया गया
था, उप-धारा (3) के अधीन विनिर्दिष्ट दरों अंत:कालीन लाभों का संदाय करने का दायी होगा।
21. किराया अधिकरण और अपील किराया अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियाँ.- (1) किराया अधिकरण
और अपील किराया अधिकरण के समक्ष प्रत्येक मामले में, साक्षी का साक्ष्य शपथपत्र द्वारा दिया जायेगा। तथापि, किराया अधिकरण या अपील किराया अधिकरण जहाँ उसे यह प्रतीत हो कि परीक्षा या प्रतिपरीक्षा के लिए किसी साक्षी को बुलाना न्याय के हित में आवश्यक है और ऐसे साक्षी को पेश किया जा सकता है, ऐसे किसी साक्षी की परीक्षा या प्रतिपरीक्षा के लिए हाजिरी का आदेश दे सकेगा ।
(2) किराया अधिकरण के समक्ष अर्जीदार द्वारा फाइल किये गये दस्तावेज उसके द्वारा प्रदर्श-1, प्रदर्श-2 और इसी प्रकार आगे लाल स्याही से स्पष्टतः चिह्नांकित किये जायेंगे और प्रत्यर्थी द्वारा फाइल किये गये दस्तावेज उसके द्वारा ऐसे हि प्रदर्श ए1, प्रदर्श-ए2 और इसी प्रकार आगे लाल स्याही से स्पष्टतः चिह्नांकित किये जायेंगे और शपथ-पत्रों में दस्तावेज इन प्रदर्श चिन्हों द्वारा निर्दिष्ट किये जायेंगे और हस्ताक्षर या शपथ-पत्रों में निर्दिष्ट दस्तावेजों के अन्य भाग, दस्तावेज फाइल करने वाले पक्षकार द्वारा ए से बी, या सी से डी और इसी प्रकार आगे लाल स्याही से स्पष्टतः चिह्नांकित किये जायेंगे।
(3) किराया अधिकरण और अपील किराया अधिकरण सिविल प्रकिया संहिता, 1908 (1908 का केन्द्रीय अधिनियम सं.5) में अधिकथित प्रक्रिया द्वारा आबद्ध नहीं होंगे, लेकिन प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त द्वारा मार्गदर्शित और इस अधिनियम या तदधीन बनाये गये नियमों के अन्य उपबंधों के अध्यधीन होंगे और उन्हें अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्तियों होंगी और इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के प्रयोजनार्थ उन्हें किसी बाद या किसी अपील का विचारण करते समय, निम्नलिखित विषयों के संबंध में वे ही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात:-
(क) किसी भी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शतथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किये जाने की अपेक्षा करना;
(ग) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन;
(घ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन जारी करना;
(ङ) व्यतिक्रम के लिए अर्जियां खारिज करना या उन्हें एकपक्षीय रूप से विनिश्चिय करना;
(च) व्यतिक्रम के लिए किसी अर्जी को खारिज करने के किसी आदेश या उसके द्वारा पारित किसी एकपक्षीय आदेश को अपास्त करना;
(छ) विधिक प्रतिनिधियों को अभिलेख पर लेना; और
(ज) अन्य कोई भी विषय जो विहित किया जाये।
(4) किराया अधिकरण कोई स्थगन, लिखित आवेदन के और कारण लेखबद्ध किये बिना प्रदान नही करेगा।
(5) किराया अधिकरण या अपील किराया अधिकरण के समक्ष की कोई कार्यवाही, भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 45) की धारा 193 और 228 के अर्थान्तर्गत और धारा 196 के प्रयोजन के लिए न्यायिक प्रक्रिया समझी जायेगी और किराया अधिकरण या अपील किराया अधिकरण या अपील किराया अधिकरण को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जायेगा।
21- क. किराया प्राधिकारी की प्रक्रिया और शक्ति. – किराया प्राधिकारी को प्रस्तुत की गयी अर्जियों या आवेदनों को ग्रहण करने, उनकी सुनवाई और विनिश्चय करते समय या दी गयी सूचना के संबंध में, किराया प्राधिकारी के संबंध में, किराया अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियों के बारे में धारा 21 में अंतर्विष्ट उपबंध, यथावश्यक परिवर्तनों सहित, उसी भांति लागू होंगे मानो शब्द किराया अधिकरण जहाँ कहीं भी उसमें आये हों, के स्थान पर शब्द “किराया प्राधिकारी” प्रतिस्थापित कर दिये गये हों ।
22. नमूना प्ररूप.- प्रत्येक अर्जी या अपील यथासम्भव इस अधिनियम की अनुसूची क और अनुसूची ख में विनिर्दिष्ट नमूना प्ररूप में होगी और प्रत्येक पुनः प्राप्ति/वसूली प्रमाणपत्र अनुसूची ग में विनिर्दिष्ट नमूना प्ररूप में होगा।
अध्याय 5 किराया प्राधिकारी की नियुक्ति, किरायेदारी करार और किरायेदारी की कालावधि
22- क. किराया प्राधिकारी की नियुक्ति. – (1) राज्य सरकार, राज-पत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम की
धारा 22-ख, 22-घ, 22-ङ, 22-छ, 23 और 24 के अधीन विनिर्दिष्ट मामलों में कृत्यों का पालन और शक्तियों का प्रयोग करने के लिए, प्रत्येक किराया अधिकरण की अधिकारिता वाले क्षेत्र के लिए, उपखंड अधिकारी से अनिम्न रैंक
के राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को किराया प्राधिकारी के रूप में नियुक्त कर सकेगी।
(2) किराया प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध कोई अपील, ऐसे आदेश की तारीख से साठ दिवस के भीतर- भीतर किराया अधिकरण के समक्ष होगी।
(3) इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, किराया प्राधिकारी का प्रत्येक आदेश, यदि अपील में उसे किराया अधिकरण द्वारा उत्तर नहीं दिया जाता, परिवर्तित या उपांतरित नहीं कर दिया जाता है, अंतिम होगा और उसे किसी भी सिविल न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जायेगा ।
22-ख. किरायेदारी करार.- (1) इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होने पर भी, राजस्थान किराया नियंत्रण (संशोधन) अधिनियम, 2017 (2017 का अधिनियम सं. 33) के प्रारम्भ के पश्चात् कोई भी व्यक्ति लिखित करार के सिवाय कोई भी परिसर न तो किराये पर देगा या न किराये पर लेगा और ऐसे करार की विशिष्टियां, भू-स्वामी और किरायेदार द्वारा संयुक्त रूप से, अनुसूची-ध में विनिर्दिष्ट प्ररूप में, किराया प्राधिकारी को संसूचित की जायेंगी।
(2) राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2017 (2017 का अधिनियम सं. के प्रारम्भ से पूर्व सृजित किरायेदारी के संबंध में जहाँ,
(क) पहले से ही लिखित करार किया गया हो, वहाँ उसकी विशिष्टियां, अनुसूची-घ में विनिर्दिष्ट प्ररूप 1 में किराया प्राधिकारी को संसूचित की जायेंगी;
(ख) कोई लिखित करार नहीं किया गया हो वहां भू-स्वामी और किरायेदार, उस किरायेदारी के संबंध में लिखित करार करेंगे और उसकी विशिष्टियां, अनुसूची-घ में विनिर्दिष्ट प्ररूप में, किराया प्राधिकारी को संसूचित करेंगे;
परन्तु; जहाँ भू-स्वामी और किरायेदार खण्ड (क) या (ख) के अधीन संयुक्त रूप से किरायेदारी करार की प्रति प्रस्तुत करने में विफल रहते हैं या खण्ड (ख) के अधीन करार करने में विफल रहते हैं, वहाँ ऐसा भू-स्वामी और किरायेदार ऐसी किरायेदारी के बारे में पृथक् रूप से विशिष्टियां फाइल करेंगे।
(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक करार, किरायेदारी के प्रारम्भ से पूर्व निष्पादित किया जायेगा और उपधारा (2) के खण्ड (ख) के अधीन निष्पादित किये जाने के लिए अपेक्षित करार, राजस्थान किराया नियंत्रण (संशोधन) अधिनियम, 2017 (2017 का अधिनियम सं. 33 ) के प्रारम्भ की तारीख से एक वर्ष की कालावधि के भीतर भीतर निष्पादित किया जायेगा ।
(4) किराया प्राधिकारी, किरायेदारी करार के बारे में 9 ऐसी सूचना प्राप्त करने के पश्चात्, उस करार की विशिष्टियों की प्रविष्टि, उस प्रयोजन के लिए संधारित रजिस्ट्रर में, जिसमें अनुसूची-घ के अनुसार विशिष्टियां होंगी, करेगा और पक्षकारों को रजिस्ट्रीकरण संख्यांक उपलब्ध करायेगा।
(5) उपधारा (1) और (2) के अनुसार उपलब्ध s करायी गयी सूचना किरायेदारी और उससे संसक्त d मामलों से
संबंधित साक्ष्य के रूप में ली जायेगी और इसके अभाव में अनुसूची-घ के अनुसार फाइल किये गये ब्यौरों से असंगत, करार में का कोई भी कथन किराया अधिकरण या यथास्थिति, अपील किराया अधिकरण के समक्ष तथ्यों के साक्ष्य के 1. में प्राप्त नहीं किया जायेगा।
(6) किराया प्राधिकारी, उपधारा (4) के अधीन c उपलब्ध कराये गये रजिस्ट्रीकरण संख्यांक सहित समस्त किरायेदारियों के ब्यौरे, रजिस्ट्रीकरण संख्यांक के आवंटन से पन्द्रह दिवस के भीतर भीतर, विहित प्ररूप और रीति से अपनी वेबसाइट पर अपलोड करेगा।
22-ग. किरायेदारी की कालावधि.- (1). राजस्थान किराया नियंत्रण (संशोधन) अधिनियम, 2017 (2017 का
अधिनियम सं. 33) के प्रारम्भ के पश्चात् की गयी समस्त किरायेदारियां भू-स्वामी और किरायेदार के बीच करार पायी गयी और किरायेदारी करार में विनिर्दिष्ट कालावधि के लिए होंगी।
(2) किरायेदार, किरायेदारी करार में करार पायी गयी कालावधि के भीतर-भीतर, किरायेदारी कालावधि की समाप्ति से पूर्व, किरायेदारी के नवीकरण या विस्तार के लिए भू-स्वामी को प्रस्ताव 1 कर सकेगा और यदि भू-स्वामी उससे सहमत हो तो पारस्परिक रूप से सहमत निबंधनों और शर्तों पर भू स्वामी के साथ एक नया किरायेदारी करार कर सकेगा।
(3) यदि नियत अवधि की किरायेदारी समाप्त हो जाती है और उसका नवीकरण नहीं किया गया है या ऐसी किरायेदारी की समाप्ति पर किरायेदार द्वारा परिसर खाली नहीं किया गया है तो, किरायेदारी उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर, जो समाप्त हो चुके किरायेदारी करार में थी, अधिकतम छह मास की कालावधि के लिए मासानुमास आधार पर नवीकृत की गयी समझी जायेगी और तत्पश्चात् समाप्त हुई समझी जायेगी, जब तक कि भू-स्वामी द्वारा किरायेदार के साथ लिखित करार द्वारा नवीकृत न कर दी जाये।
अध्याय 5-ख कतिपय परिस्थितियों में किराये का पुनरीक्षण, कतिपय परिस्थितियों में प्रतिभूति निक्षेप, किराये को जमा कराना, इत्यादि
22 घ. कतिपय परिस्थितियों में किराये का पुनरीक्षण.- (1) जहाँ भू-स्वामी ने किरायेदारी के प्रारम्भ के पश्चात् और किरायेदार की सहमति से किरायेदार द्वारा अधिमुक्त परिसर में सुधार, परिवर्धन या संरचनात्मक परिवर्तन, जिसमें आवश्यक रूप से की जाने वाली मरम्मत सम्मिलित नहीं है, के महे व्यय उपगत किया है वहाँ, भू-स्वामी परिसर का किराया ऐसी रकम तक बढ़ा सकेगा जो कार्य के प्रारम्भ से पूर्व उस भू-स्वामी और किरायेदार के बीच करार पायी गयी हो और किराये में ऐसी वृद्धि कार्य के पूर्ण होने के एक मास पश्चात् से प्रभावी होगी।
(2) जहाँ किसी परिसर का किराया करार पाये जाने या नियत हो जाने के पश्चात् परिसर में वास सुविधाओं या आवासन सेवाओं में घटाव या कमी या ह्रास हो गया हो तो किरायेदार किराये में कमी करने का दावा कर सकेगा।
(3) भू-स्वामी या तो परिसर और आवासन सेवाओं को उसी रूप में ला सकेगा जैसी कि वे किरायेदारी के प्रारम्भ पर थीं या किराये में कमी करने के लिए सहमत हो सकेगा।
(4) विवाद की दशा में, भू-स्वामी या किरायेदार किराया प्राधिकारी के समक्ष अर्जी फाइल करके किराया प्राधिकारी से निवेदन कर सकेगा और प्राधिकारी उस विवाद का समाधान करने का और भू-स्वामी और किरायेदार के बीच सौहार्दपूर्ण समझौता कराने का प्रयास करेगा और यदि पक्षकारों के बीच ऐसा कोई समझौता नहीं होता है तो, वह अभिलेख पर उपलब्ध करायी गयी सामग्री के आधार पर और दोनों पक्षकारों को सुनकर समुचित आदेश पारित कर सकेगा।
22- ङ. किराया प्राधिकारी द्वारा धारा 22-घ में विनिर्दिष्ट परिस्थितियों में पुनरीक्षित किराया नियत करना.-
किराया प्राधिकारी, धारा 22-घ में विनिर्दिष्ट परिस्थितियों में भू-स्वामी या किरायेदार द्वारा प्रस्तुत किसी आवेदन पर, किरायेदार द्वारा संदेय किराया और अन्य प्रभार नियत या यथास्थिति, पुनरीक्षित करेगा, वह तारीख भी नियत करेगा जिससे पुनरीक्षित किराया संदेय होगा।
22- च. प्रतिभूति निक्षेप. – ( 1 ) किसी प्रतिकूल करार के सिवाय, एक मास के किराये के बराबर प्रतिभूति निक्षेप प्रभारित करना भू-स्वामी के लिए विधिपूर्ण होगा।
(2) परिसर खाली करने के पश्चात्, प्रतिभूति निक्षेप किरायेदार के किसी दायित्व की सम्यक् कटौती करने के पश्चात् एक मास के भीतर-भीतर, किरायेदार को प्रतिदत्त कर दिया जायेगा।
(3) जहाँ प्रतिभूति निक्षेप, उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट कालावधि के भीतर-भीतर किरायेदार को प्रतिदत्त नहीं किया जाता है, वहाँ किरायेदार, भू-स्वामी को प्रतिभूति निक्षेप का प्रतिदाय करने के लिए निदेशित करने हेतु, किराया प्राधिकारी के समक्ष आवेदन फाइल कर सकेगा।
22- छ. कतिपय परिस्थितियों में किराया प्राधिकारी को किराया जमा कराना. – (1) जहाँ भू-स्वामी, किरायेदार
द्वारा धारा 5 में विनिर्दिष्ट रीति से दिया गया कोई किराया स्वीकार नहीं करता है, या रसीद देने से इंकार करता है, वहाँ किरायेदार उस किराये को कालिकतः किराया प्राधिकारी को समय पर जमा करा सकेगा।
(2) जहाँ कहीं भी किसी मामले में उस व्यक्ति या व्यक्तियों के बारे में, जिसे किराया संदेय है, कोई सद्भाविक संदेह है, वहाँ किरायेदार ऐसा किराया, किराया प्राधिकारी को जमा करा सकेगा।
(3) किराया प्राधिकारी, ऐसा किराया जमा होने पर, उस मामले का अनुसंधान करेगा और मामले के तथ्यों पर आधारित आदेश पारित करेगा।
(4) इस धारा के अधीन जमा कराये गये किराये की रकम का लेखा-जोखा ऐसी रीति से रखा जायेगा, जो विहित की जाये और व्यक्तिगत जमा खाते में रखा जायेगा और भू-स्वामी या अन्य विधिपूर्ण दावेदार को ऐसी रीति से, जो विहित की जाये, संदाय करने के लिए, संचालित किया जायेगा ।
(5) उपधारा (1) या, यथास्थिति, उपधारा (2) के अधीन जमा कराये गये किराये के संबंध में भू स्वामी की रसीद,
किराये के सही होने और इसको जमा कराने के दौरान किरायेदार द्वारा कथित अन्य तथ्य की स्वीकृति के रूप
में प्रभावी नहीं होगी।
अध्याय 6 सुख-सुविधाएं
23. किरायेदार द्वारा उपभोग की जाने वाली सुख सुविधाओं को भू-स्वामी द्वारा बन्द या विधारित नहीं किया जाना. – (1) कोई भी भू-स्वामी या तो स्वयं या किसी व्यक्ति के माध्यम से कार्य करते हुए या उसकी ओर से कार्य करने के लिए तात्पर्यित व्यक्ति, किरायेदार द्वारा उसे किराये पर दिये गये परिसर के संबंध में, उपभोग की जा रही सुख सुविधाओं को बंद या विधारित नहीं करेगा। तथापि भू-स्वामी ऐसी सुख- सुविधा को किराया प्राधिकारी की अनुज्ञा से बंद या विधारित कर सकेगा और किराया प्राधिकारी ऐसी अनुज्ञा देगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि किरायेदार ने सुख-सुविधा के संबंध में ऐसे प्रभारों का संदाय नहीं किया है जिनका संदाय करने का उसका दायित्व था।
(2) सुख-सुविधाओं को बंद या विधारित करने की अनुज्ञा के लिए भू-स्वामी की अर्जी पर या सुख सुविधाओं के प्रत्यावर्तन के लिए किरायेदार की अर्जी पर, किराया प्राधिकरण दूसरे पक्षकार को नोटिस जारी करेगा और पक्षकारों को सुनने के पश्चात् ऐसे आदेश पारित करेगा जो वह उचित समझे ।
(3) इस धारा के अधीन जांच के लंबित रहने के 19(10) दौरान, [किराया प्राधिकरण] ऐसे अंतरिम आदेश अन्तवर्ती पारित कर सकेगा जो वह उचित समझे।
(4) किराया प्राधिकरण इस धारा के अधीन कार्यवाहियों का संचालन संक्षिप्त रीति से करेगा और भू- स्वामी या किरायेदार द्वारा इस धारा के अधीन किये गये किसी भी आवेदन का निपटारा अर्जी के पेश किये जाने की तारीख से साठ दिन के भीतर- भीतर करेगा।
24. किरायेदार और भू-स्वामी के कर्त्तव्य. – (1) किसी लिखित करार के अभाव में, एक वर्ष में वार्षिक किराये के 5 प्रतिशत तक का व्यय अंतर्वलित करने वाली आवश्यक मरम्मत किरायेदार द्वारा अपने स्वयं के खर्च पर करायी जायेगी और वार्षिक किराये के 5 प्रतिशत से अधिक का व्यय अंतर्वलित करने वाली आवश्यक मरम्मत किरायेदार का नोटिस प्राप्त होने पर भू-स्वामी द्वारा करायी जायेगी;
परन्तु; जहाँ भू-स्वामी नोटिस की प्राप्ति की तारीख से पन्द्रह दिन की कालावधि के भीतर-भीतर आवश्यक मरम्मत कराने में उपेक्षा करता है, वहाँ किरायेदार मरम्मत कराने की अनुज्ञा के लिए, ऐसी मरम्मत के अनुमान के साथ [किराया प्राधिकारी] में समावेदन करने के लिए स्वतंत्र होगा और जहाँ किराया प्राधिकारी द्वारा अनुज्ञा दे दी जाती है, वहाँ यह भू-स्वामी से ऐसे खर्चे की, किरायेदार द्वारा संदेय किराये के प्रति ऐसी रकम की मुजराई के द्वारा वसूली के संबंध में आदेश भी पारित करेगा।
(2) धारा 23 की उप-धारा (2), (3) और (4) के उपबंध इस धारा के अधीन किराया अधिकरण के समक्ष की
कार्यवाहियों पर यथावश्यक परिवर्तनों सहित लागू होंगे।
24- क. धारा 23 या 24 के अधीन लम्बित कार्यवाहियों का निपटारा. – राजस्थान किराया नियंत्रण (संशोधन) अधिनियम, 2017 (2017 का अधिनियम सं. 33 ) के प्रारम्भ की तारीख से धारा 23 या 24 के अधीन किराया अधिकरण के समक्ष लम्बित समस्त कार्यवाहियां जारी रहेंगी और किराया अधिकरण उन पर समुचित आदेश पारित कर सकेगा मानो कि धारा 23 या 24 उक्त अधिनियम द्वारा संशोधित नहीं की गयी थी ।
अध्याय 7 प्रकीर्ण
25. परिसर का निरीक्षण.- किरायेदार को कम से कम सात दिन की पूर्व सूचना देने के पश्चात् भू स्वामी को, उसके द्वारा किराये पर दिये गये परिसर का निरीक्षण दिन में करने का अधिकार होगा। तथापि भू-स्वामी द्वारा ऐसा निरीक्षण तीन मास में एक बार से अधिक नहीं किया जायेगा।
26. अधिकरण के सदस्यों और कर्मचारिवृंद का लोक सेवक होना और उन पर नियंत्रण. – (1) किराया अधिकरणों और अपील किराया अधिकरणों के पीठासीन अधिकारी और कर्मचारी भारतीय दंड संहिता, 1860 (1860 का केन्द्रीय अधिनियम सं. CPC 45) की धारा 21 के अन्तर्गत लोक सेवक समझे 207 जायेंगे।
(2) किराया अधिकरणों और अपील किराया अधिकारी अधिकरणों के पीठासीन अधिकारी उच्च न्यायालय 5 के प्रशासनिक और अनुशासनिक नियंत्रण के अधीन कार्य करेंगे।
(3) अपील किराया अधिकरणों के पीठासीन अधिकारी अपनी अधिकारिता के अधीन के किराया अधिकरणों पर अधीक्षण और नियंत्रण की साधारण शक्ति का प्रयोग करेगा जिसमें किराया अधिकरणों के पीठासीन अधिकारियों के कार्य मूल्यांकन और वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदनों के अभिलेखन की शक्ति सम्मिलित है।
(4) किराया अधिकरणों और अपील किराया अधिकरणों के लिपिकवर्गीय कर्मचारी राजस्थान अधीनस्थ न्यायालय लिपिकवर्गीय स्थापन नियम 1986 के द्वारा शासित होंगे और इन नियमों के प्रयोजन के लिए अपील किराया अधिकरण जिला और सेशन न्यायधीश के न्यायालय समझे जायेंगे और किराया अधिकरण मिथिल न्यायधीश (वरिष्ठ खण्ड) के न्यायालय समझे जायेंगे।
(5) किराया अधिकरणों और अपील किराया 5 अधिकरणों के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी राजस्थान चतुर्थ 5 श्रेणी
सेवा (भर्ती और सेवा की अन्य शर्ते) नियम, 1999 के द्वारा शासित होंगे।
26 क. किराया प्राधिकारी का लोक सेवक होना और कार्रवाइयों का संरक्षण.– (1) इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किराया प्राधिकारी का पीठासीन अधिकारी भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझा जायेगा।
(2) इस अधिनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गयी या किये जाने के लिए आशयित किसी बात के संबंध में किराया प्राधिकारी के विरुद्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी ।
27. परिसीमा.- इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 36) के उपबंध किसी किराया अधिकरण या किसी अपील किराया अधिकरण के समक्ष फाइल या अग्रसर की गयी अर्जियों, आवेदनों, अपीलों या अन्य कार्यवाहियों पर यथाशक्य लागू होंगे।
28. न्यायालय फीस.- (1) उप-धारा (2), (3) और (4) में यथाउपबंधित के सिवाय, अधिकरण के समक्ष फाइल
की गयी अर्जियों, आवेदनों, अपीलों पर संदेय न्यायालय की फीस वही होगी जो ऐसे ही अनुतोष के लिए सिविल न्यायालयों के समक्ष वाद, आवेदन या अपीलें फाइल किये जाने पर संदेय होती।
(2) धारा 8 के अधीन सीमित कालावधि की किरायेदारी के लिए संयुक्त अर्जी पर और ऐसी अर्जी पर के किसी आदेश के विरुद्ध अपील पर राजस्थान न्यायालय फीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961 (1961 का अधिनियम सं. 21) के अधीन मूल्यानुसार न्यायालय फीस, उस कालावधि को ध्यान में लाये बिना जिसके लिए सीमित कालावधि की किरायेदारी की जानी इंप्सित है, अर्जी के प्रस्तुत किये जाने की तारीख से ठीक पहले के वर्ष के लिए संदेय किराये की रकम पर संदेय होगी।
(3) धारा 22-ङ के अधीन किसी आवेदन पर या धारा 23 के अधीन या धारा 24 के अधीन किसी अर्जी पर और ऐसे आवेदन या अर्जी पर किसी भी आदेश के विरुद्ध किसी अपील पर 100/- रु. की नियत न्यायालय फीस संदेय होगी।
(4) धारा 6 या धारा 7 के अधीन किराये के पुनरीक्षण के लिए अर्जी पर ओर ऐसी किसी अर्जी पर के किसी आदेश के विरुद्ध अपील पर 250 रु की नियत न्यायालय फीस संदेव होगी।
29. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना.- इस अधिनियम के उपबंधों का, तत्समय प्रवृत्त किसी भी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी भी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में उनसे असंगत किसी बात के अन्तर्विष्ट होने पर भी, प्रभाव होगा।
30. कठिनाइयों के निराकरण की शक्ति.- (1), यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उद्भत हो तो राज्य सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों, और जो कठिनाई का निराकरण करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो
परन्तु ऐसा कोई भी आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से तीन वर्ष की कालावधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जायेगा।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, उसके किये जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, राज्य विधान मण्डल के समक्ष, जब वह सत्र में हो, रखा जायेगा।
31. नियम बनाने की शक्ति.- (1) राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी।
(2) इस अधिनियम के अधीन बनाये गये समस्त नियम उनके इस प्रकार बनाये जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, राज्य विधान मण्डल के सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, चौदह दिन से अन्यून की ऐसी कालावधि के लिए रखे जायेंगे जो एक सत्र या दो उत्तरोत्तर सत्रों में समाविष्ट हो सकेगी और यदि, ऐसे सत्र, जिसमें वे इस प्रकार रखे गये हैं या ठीक अगले सत्र की समाप्ति के पूर्व राज्य विधान मण्डल का सदन, ऐसे किन्हीं नियमों में कोई भी उपान्तरण करता है या यह संकल्प करता है कि ऐसे कोई नियम नहीं बनाये जाने चाहिए तो उक्त नियम तत्पश्चात् केवल ऐसे उपान्तरित रूप में प्रभावी होंगे या यथास्थिति उनका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि ऐसा कोई उपान्तरित रूप में प्रभावी होंगे या यथास्थिति, उनका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि ऐसा कोई उपान्तरण या बातिलकरण तदधीन पूर्व में की गयी किसी बात की विधिमान्यता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा।
32. निरसन और व्यावृत्तियां. – (1) राजस्थान परिसर (किराया तथा बेदखली नियंत्रण) अधिनियम, 1950 (1950 का अधिनियम सं. 17) इस अधिनियम की धारा 1 की उप-धारा (3) के अधीन अधिसूचित तारीख से निरसित हो जायेगा।
(2) उप-धारा (1) के अधीन का निरसन,
(क) इस प्रकार निरसित अधिनियमिति के अधीन सम्यक् रूप से की गयी या भुक्त किसी बात को; या
(ख) इस प्रकार निरसित अधिनियमिति के अधीन अर्जित या उपगत किसी अधिकार, हक, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व को; या
(ग) इस प्रकार निरसित अधिनियमिति के उपबंधों के अधीन उपगत या भुक्त किसी जुर्माने, शास्ति या दण्ड को, प्रभावित नहीं करेगा।
(3) उपधारा (1) के अधीन निरसन होने पर भी,-
(क) इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख को, निरसित अधिनियम के अधीन किसी भी न्यायालय के समक्ष लंबित समस्त आवेदन, वाद या अन्य कार्यवाहियां निरसित अधिनियम के उपबंधों के अनुसार इस प्रकार चालू रखी और निपटायी जायेंगी मानो निरसित अधिनियम प्रवृत्त बना रहा था और इस अधिनियम को अधिनियमित नहीं किया गया था। तथापि, वादी इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के एक सौ अस्सी दिन की कालावधि के भीतर-भीतर इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन और अनुसार ऐसे बाद या अपील या किसी अन्य कार्यवाही की विषय-वस्तु के संबंध में नयी अर्जी फाइल करने की स्वतंत्रता के साथ निरसित अधिनियम के अधीन लंबित किसी वाद या अपील या किसी अन्य कार्यवाही को प्रत्याहृत करने का हकदार
होगा और परिसीमा के प्रयोजनों के लिए ऐसी अर्जी, यदि इस अधिनियम के प्रारंभ से दो सौ सत्तर दिन की कालावधि के भीतर-भीतर फाइल कर दी जाये तो, इस प्रकार प्रत्याहृत किये गये वाद के फाइल किए जाने की तारीख को और अपील या अन्य कार्यवाही के प्रत्याहरण की दशा में बाद जिससे ऐसी अपील या कार्यवाही आरंभ हुई, के फाइल किये जाने की तारीख को फाइल किया हुआ समझा जायेगा;
(ख) निरसित अधिनियम के अधीन अपील संबंधी उपबंध, तद्धीन निपटाये गये आवेदनों, वादों और कार्यवाहियों के संबंध में प्रवृत्त बने रहेंगे;
(ग) निरसित अधिनियम के उपबंधों के अधीन संस्थित समस्त अभियोजन प्रभावी रहेंगे और ऐसी विधि के अनुसार निपटाये जायेंगे;
(घ) लंबित मामले रिसित अधिनियम के अधीन बनाये गये या जारी किये गये और इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख को प्रवृत्त किसी भी नियम या अधिसूचना के द्वारा शासित होते रहेंगे।