शुक्रवार, फ़रवरी 28, 2025
spot_imgspot_img

पुलिस एफ आई आर दर्ज न करे तो क्या करें | first information report

first information report: पुलिस एफ आई आर दर्ज न करे तो क्या करें | what will you do if the police do not register

आपके साथ भी ऐसा अनुभव हुआ होगा या सुना होगा कि जब आप पुलिस थाने एफ आई आर दर्ज कराने जाते हैं तो पुलिस एफ आई आर लिखने से मना कर देती है या टालमटोल की नीति अपनाती है।

तब ऐसी condition में आपके पास कौन से विकल्प अर्थात options होते हैं, जिनके माध्यम से आप एफ आई आर दर्ज कर सकते हैं,

इस लेख में इन्हीं विकल्पों को जानेंगे साथ यह भी जानेंगे कि वे कौन से कारण हैं, जिनकी वजह से पुलिस एफ आई आर लिखने से मना कर देती है।

इसे हम 4 पार्ट में डिवाइड करके समझेंगे जिससे सारी बातों को आसानी से समझा जा सके

सबसे पहले हम जानेंगे की एफ आई आर क्या होती है ?

दूसरी बात हम जानेंगे कि पुलिस एफ आई आर लिखने मना क्यों करती है? यानि वे  कारण कौन से हैं जिनकी वजह से पुलिस  मना कर देती है।

तीसरी बात जब पुलिस एफ आई आर लिखने से मना कर देती है तब आपके पास कौन से विकल्प होते हैं जिनके माध्यम से एफ आई आर दर्ज कर सकते हैं।

लास्ट में जानेंगे कि जो पुलिस ऑफिसर f.i.r. लिखने से मना करता है उसके अगेंस्ट क्या कार्रवाई की जा सकती है। 

एफ आई आर क्या होती है ? what is f i r ?

एफ आई आर जिस की फुल फॉर्म होती है first information report जिसे हिंदी में प्रथम सूचना प्रतिवेदन कहते है। F.i.r. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि किसी संज्ञेय अपराध के संबंध में पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी को दी गई पहली सूचना होती है।

यानी संक्षेप में कहें तो संज्ञेय अपराध के संबंध में पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी को दी गई प्रथम सूचना ही f.i.r. कहलाती है।

F.i.r. को वैसे तो कानून में परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 154 में इसे लेखबद्ध करने की प्रक्रिया बताई गई है इसलिए इस धारा में ही निहित माना जाता है।

धारा 154 यह प्रावधान करती है कि, संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी यानी कि थाना इंचार्ज को दी जाएगी और ऐसी सूचना, मौखिक या लिखित रूप में दी जा सकती है । जब ऐसी सूचना मौखिक दी जाती है, तो थाना इंचार्ज उसे लिखित कराएगा ।

जो व्यक्ति सूचना देता है उसे इसकी एक प्रति निशुल्क दी जाएगी

एक और इंपॉर्टेंट बात यदि मामला महिला के विरुद्ध लैंगिक अपराधों से जुड़ा है, तब उस दशा में f.i.r. केवल महिला पुलिस अधिकारी या महिला अधिकारी ही लिखेगी।

हमने शॉर्ट में देखा एफ आई एफ आई आर क्या होती है।

पुलिस FIR लिखने से मना क्यों करती है?

वे conditions जिनमें पुलिस f.i.r. लिखने से मना कर देती है या टालमटोल की नीति अपनाती है। कुछ कंडीशन में तो यह रीजंस वैलिड होते हैं, पर ज्यादातर में यह वैलिड रीजन नहीं होते हैं।

    • पहला रीजन हो सकता है कि आप जिस अपराध की रिपोर्ट दर्ज कराने गए हैं, वह मामला संज्ञेय अर्थात् cognizable ही न हो। तब इस कंडीशन में थाना इंचार्ज एफ आई आर लिखने से मना कर सकता है या आपको मजिस्ट्रेट के पास जाने को कह सकता है।
    • दूसरा करण हो सकता है मामला उसकी अधिकारिता में ना आता हूं अतः अपराध उसके थाने की सीमाओं में ना हुआ हो तब मना कर सकता है हालांकि यह रीजन vailid नहीं लगता है,क्योंकि जीरो  f.i.r. का भी प्रावधान है।
    • तीसरा रीजन हो सकता है कि थाना इंचार्ज इन्वेस्टिगेशन के लिए गया हो। यह रीजन भी तभी vailid माना जाता है जब किसी अन्य पुलिस ऑफिसर को थाना इंचार्ज का प्रभार ना दिया गया हो।

उपरोक्त कारण एक बार vailid यानी वैध माने जा सकते हैं। हालांकि कुछ कारण ऐसे होते हैं जो vailid नहीं होते हैं, किंतु पुलिस ऑफिसर द्वारा f.i.r. ना लिखने के पीछे कहीं न कहीं मौजूद होते हैं।

    1.  हो सकता है मामला जो है सगे-संबंधियों वा दोस्तों, आदि  के बीच का है। जिनमें उसको यह लगता है कि बाद में  वे आपस समझौता कर सकते हैं।
    2. अपने थाने की क्राइम रेट को कम दिखाने के लिए f.i.r. लिखने से मना कर दे। क्योंकि जब अपराध रजिस्टर्ड ही नहीं होगा तो रिकॉर्ड में नहीं आएगा और क्राइम रिपोर्ट में थाने में कम अपराधिक रिकॉर्ड शो करेगा।
    3. सामने वाली पार्टी से अच्छी- खासी रकम मिल गई हो।तब इस कंडीशन में आप बहुत परेशान हो सकते हैं । बहुत ही कम पुलिस वाले ऐसे होते हैं,जो अपना काम ईमानदारी से करते हैं।

यही वह प्रमुख वजह है जिनमें पुलिस थाने का इंचार्ज f.i.r. लिखने से मना कर दे हालांकि जरूरी नहीं है कि यही कारण आप के मामले में भी विद्यमान हो और भी कई कारण हो सकते हैं।

अगर पुलिस एफ आई आर लिखने से मना करे तब आपके पास उपलब्ध उपचार 

वैसे तो पुलिस थाने का इंचार्ज  संज्ञेय अर्थात् cognizable अपराधों की f.i.r. लिखने के लिए बाध्य अर्थात bound होता है। वह ज्यादा से ज्यादा इस बात की जांच कर सकता है,कि जिस अपराध की सूचना दी गई है, वह संज्ञेय अर्थात् cognizable है अथवा नहीं ।ऐसा स्वयं माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा [ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2013] के मामले में कहा गया है।

जब अपराध की सूचना दी जाती है, और थाना इंचार्ज f.i.r. लिखने से मना कर देता है। तो जो विकल्प को मिलते हैं, उन्हें समझने की दृष्टि से हम दो भागों में डिवाइड कर लेते हैं।पहले भाग में कानून के भीतर रहकर कौन-कौन से उपचार उपलब्ध होते हैं, उन पर बात करेंगे।फिर उन उपचारों को जानेंगे जो कानून से बाहर उपलब्ध होते हैं।

F.i.r. ना लिखने पर विधिक उपचार

    1. जब पुलिस थाने का इंचार्ज f.i.r. लिखने से मना कर दी तो आपके पास सबसे पहला विकल्प होता है कि आप सूचना को लिखकर उस थाने के पते पर रजिस्टर्ड है स्पीड पोस्ट के माध्यम से भेज दें और जो पोस्ट की स्लिप आपको मिली है, उसे संभाल कर रखें।
    2.  E – FIR अर्थात ऑनलाइन f.i.r. – आप अपने स्टेट पुलिस की वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन एफ आई आर दर्ज करा सकते हैं। हालांकि e-fir हर मामले में दर्ज नहीं की जा सकती है, केवल कुछ विशिष्ट अपराध ही है जिनमें ऑनलाइन एफ आई आर दर्ज की जा सकती है। जैसे गुमशुदगी, चोरी, साइबर अपराध आदि इनकी संख्या राज्य वार कुछ कम या ज्यादा हो सकती हैं।

e fir के लिए इम्पॉर्टन्ट लिंक  –

3 .जिले के पुलिस अधीक्षक यानी एसपी को लिखित में वह सूचना रजिस्टर या स्पीड पोस्ट से भेज कर या आप स्वयं ही एसपी ऑफिस में उपस्थित होकर अपनी f.i.r. दे सकते हैं।

जब आप एसपी को देने के लिए अपनी एफ आई आर को एक सादा कागज पर लिखेंगे तो उसमें उस बात को भी मेंशन करना कि आप थाने गए और f.i.r. लिखने से मना कर दिया गया, उसके पश्चात यह सूचना आपको दी जा रही है।

4.आप दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156( 3) के अंतर्गत संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं और उन्हें सूचना दे सकते हैं ।

यदि आपको नहीं पता कि कौन से मजिस्ट्रेट के पास जाया जाए । तब ऐसी कंडीशन में आप सीजीएम अर्थात मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं ।इसमें जब उन्हें सूचना मिलेगी तो वह पुलिस को f.i.r. लिखने वा इन्वेस्टीगेशन के लिए आदेश दे सकते हैं।

पुलिस की शिकायत कहां करें |भार साधक अधिकारी पर कार्रवाई

आप पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी यदि f.i.r. लिखने से मना कर देता है तब उस पर क्या एक्शन लिया जा सकता है अर्थात कार्रवाई की जा सकती है शार्ट में समझ लेते हैं जो की निम्न लिखित  है

    • विभागीय कार्रवाई की जा सकती है, यह केवल पुलिस विभाग के द्वारा की जा सकती है। 
    • न्यायालय की अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है यानी कि जिसे हम कन्टेम्प्ट ऑफ कोर्ट के नाम से जानते हैं।
    • भारतीय दंड संहिता की धारा 166 ए के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है।
    • मानव अधिकार आयोग से शिकायत की जा सकती है।

अत: जब पुलिस एफ आई आर लिखने से मन करे तब इतने विकल्प आप को प्राप्त होतें है जिनका उपयोग करके आप अपनी एफ आई आर आसानी से दर्ज करा सकतें हैं।

Get in Touch

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

spot_imgspot_img
spot_img

Get in Touch

3,646फॉलोवरफॉलो करें
22,200सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

Latest Posts

© All rights reserved