आज के इस लेख में हम बात करने वाले हैं अपराध क्या होता है और अपराध से संबंधित उसके आवश्यक तत्व क्या है
अपराध का शाब्दिक अर्थ –
सर विलियम ब्लेकस्टोन नेे अपनी पुस्तक “कमेंट्री ऑन द लॉस ऑफ इंगलैंड ” मैं अपराध को इस प्रकार से परिभाषित किया कि -“निषिद्ध या समावेशित करने वाली सार्वजनिक विधि के उल्लंघन में किया गया कार्य या लोप अपराध कहलाता है।”
केनी के अनुसार– “अपराध ऐसे दोष हैं जिनमें अनुशास्ति दंडात्मक होती है, जो किसी सामान्य व्यक्ति के द्वारा क्षम्य नहीं है और यदि क्षम्य है तो केवल सम्राट के द्वारा।”
सर जेम्स स्टीफेन के अनुसार- “अपराध
भारतीय दंड संहिता धारा 40 के अनुसार-
इस धारा के खंड 2 और 3 में वर्णित (अध्यायो) और धारा के सिवाय अपराध शब्द इस संहिता द्वारा दंडनीय की गई किसी बात का द्योतक है।
उपरोक्त परिभाषा के अनुसार केवल वह कार्य ही अपराध है जो भारतीय दंड संहिता में दंड बतलाए गए हैं। किंतु यह परिभाषा भारतीय दंड संहिता के अधीन निषिद्ध कार्यों को दंडित करने की बात करती है।
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 2 (n )के अनुसार
धारा 2(n)– इस संहिता में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित ना हो, “अपराध से कोई ऐसा कार्य या लोप अभिप्रेत है, जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के द्वारा दंडनीय बना दिया गया है और इसके अंतर्गत कोई ऐसा कार्य भी है, जिसके बारे में पशु अतिचार अधिनियम 1871 (1871का 1) की धारा 20 के अधीन परिवाद किया जा सकता है।
अपराध के आवश्यक तत्व-
1.मानव/व्यक्ति( person) –
अपराध के लिए आवश्यक है कि किसी व्यक्ति ने अपराध किया हो तभी उसे विधि द्वारा किए गए अपराध के लिए दायी ठहराया जा सकता है, व्यक्ति शब्द के अंतर्गत कोई भी कंपनी संगम या व्यक्ति निकाय आता है , चाहे वह निगमित हो या ना हो।
2. दुराश्य (intension)–
किसी व्यक्ति को किसी आपराधिक कार्य के लिए तब तक दंडित नहीं किया जा सकता जब तक कि उसका आशय उस अपराध को करने का ना हो अर्थात उसका मन दोषी ना हो। दुराश्य से तात्पर्य निम्न सूक्तियों के आधार पर लिया जाता है-
3.कार्य या लोप(act or omission)-
अपराध के लिए आशय के साथ-साथ कार्यालय का किया जाना भी आवश्यक होता है अर्थात अपराधिक आशय भले ही हो जब तक कोई कार्य लोक नहीं किया जाता तब तक अपराध नहीं किया जा सकता ।
केनी के अनुसार – अपराधिक कृत्य मानव आचरण का वह परिणाम है जिसे विधि ने निषिद्ध करना चाहता है या किया किया गया है या लोपित कार्य निश्चिता विधि द्वारा निषिद्ध या आदेशित होना ही चाहिए।