आपराधिक कार्यवाही में निजता के अधिकारों की रक्षाः सर्वोच्च न्यायालय का एक महत्वपूर्ण निर्णय
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में, किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार की रक्षा के महत्व पर जोर दिया, विशेष रूप से आपराधिक कार्यवाही में। दरअसल इस मामले में अपीलार्थी इंद्रकुंवर नाम की महिला को उसके नवजात बच्चे की कथित हत्या के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अधीन दोषसिद्ध किया गया। हालांकि, न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी और मृतक बच्चे के बीच एक ठोस संबंध स्थापित करने में विफल रहा, जो आपराधिक मामलों में मजबूत सबूत की आवश्यकता को उजागर करता है। यह निर्णय भारतीय कानूनी प्रणाली में गोपनीयता अधिकारों और निष्पक्ष सुनवाई सिद्धांतों के महत्व पर प्रकाश डालता है।
अपील में विचारणीय प्रश्न :
वर्तमान अपील में विचार हेतु निम्न प्रश्न उत्पन्न हुए हैं:
1) किस विस्तार तक निजता का अधिकार अपराध की अभियुक्त महिला के निजी जीवन से संबंधित मामलों की रक्षा करता है, विशिष्टत: जब अभियोजन अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में विफल रहा हो?
2) किस विस्तार तक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अधीन कथन में उनके खिलाफ दिखाई देने वाली आपत्तिजनक परिस्थितियों को स्पष्ट करना अभियुक्त के अधिकार या कर्तव्य है ?
निजता और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकारः
सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि निजता का अधिकार अनअतिक्रमणीय है तथा आपराधिक मामलों में भी इसका सम्मान किया जाना चाहिए। इस बात पर जोर दिया कि अभियुक्त के दोष को साक्ष्य के ठोस आधार के बिना स्थापित नहीं किया जा सकता है। नयायालय ने अभियोजन के दायित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वह अपने मामले को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करे, यह सुनिश्चित करते हुए कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला में प्रत्येक कड़ी पूरी हो तथा पूरी तरह से अभियुक्त के अपराध की ओर इशारा करे।
द.प्र. सा. की धारा 313 के अधीन कथन :
निर्णय में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अधीन अभियुक्त के कथन के महत्व पर भी चर्चा की गई। यह प्रावधान अभियुक्त को अपने विरुद्ध साक्ष्य में दिखाई देने वाली किसी भी परिस्थिति को स्पष्ट करने में सक्षम बनाता है, जिससे न्यायालय तथा अभियुक्त के बीच संवाद स्थापित होता है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि इस प्रक्रिया से अभियुक्त को लाभ होता है तथा न्यायालय को निष्पक्ष निर्णय पर पहुंचनेमें सहायता मिलती है। इस धारा का गैर-अनुपालन अभियुक्त के प्रति पूर्वाग्रह पैदा कर सकता है और निष्पक्ष निर्णय लेने की प्रक्रिया में बाधा डाल सकता है।
अभियोजन ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत अपीलार्थी के बयान पर भरोसा किया, जहां उसने गर्भवती होने की बात स्वीकार की, लेकिन मृतक बच्चे के साथ किसी भी संबंध से इनकार किया। अधीनस्थ नयायालय ने माना कि अपीलार्थी दोषपूर्ण परिस्थितियों की व्याख्या करने में विफल रही और उसकी चुप्पी अपराध स्वीकार करने के बराबर है।
साक्ष्य और सजा: न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि आजीवन कारावास की सजा देने के लिए साक्ष्य की सावधानीपूर्वक अधिमूल्यन की आवश्यकता होती है और इसे यांत्रिक रूप से या निष्पक्ष तरीके से नहीं किया जा सकता है। विधि अनुसार, उच्च न्यायालय को साक्ष्यों का पुन:अधिमूल्यन करना चाहिए तथा विचारण न्यायालय द्वारा लिखिततथ्य के निष्कर्षों की या तो पुष्टि करनी चाहिए या उन्हें उलट देना चाहिए। इस बात पर जोर दिया गया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि केवल तभी की जानी चाहिए जब श्रृंखला के सभी कड़ियाँ पूर्ण हों, जो पूर्ण रूप से अभियुक्त के अपराध की ओर इंगित करती हों तथा निर्दोषिता के किसी भी तत्व को निरस्त कर दें।
महिलाओं की निजता और गरिमा का अधिकारः
सर्वोच्च न्यायालय ने दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और अपीलार्थी को दोषमुक्त कर दिया अभिनिर्धारित किया कि महिलाओं की निजता और गरिमा का अधिकार अनतिरकमणीय है और मात्र अनुमान या संदेह से समझौता नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन अपीलार्थी और मृतक बच्चे के बीच कोई संबंध स्थापित करने में विफल रहा है , तथा अपीलार्थी का गर्भपात या उसके बाद के विवरण का प्रकट करने की कोई बाध्यता नहीं थी। न्यायालय ने निचली न्यायालय की भाषा और दृष्टिकोण की भी आलोचना की, जिसने सांस्कृतिक रूढ़िवादिता और लैंगिक पहचान को मजबूत किया।