भारत की लोकतांत्रिक संरचना में न्यायिक पुनर्विलोकन एक सशक्त रक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, जो संविधान की सर्वोच्चता सुनिश्चित करता है एवं नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करता है। न्यायपालिका को विधायिका द्वारा पारित अधिनियमों और कार्यपालिका के आदेशों की संवैधानिकता का परीक्षण करने की शक्ति प्राप्त है। यह मात्र एक प्रक्रियात्मक परीक्षण नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था का मूल आधार है, जो राज्य के तीन अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के बीच शक्ति संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है।
समय-समय पर उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालयों ने अपने न्यायिक पुनर्विलोकन अधिकार का प्रयोग करते हुए विभिन्न विधायी अधिनियमों एवं प्रशासनिक आदेशों की संवैधानिकता की जांच की है। चाहे आर्थिक नीतियों की संवैधानिकता पर प्रश्न उठे हों, व्यक्तिगत अधिकारों से संबंधित विवाद हों या चुनावी प्रक्रियाओं पर चर्चा हो—न्यायिक पुनर्विलोकन का सिद्धांत निरंतर प्रासंगिक बना रहता है। यह भारतीय शासन व्यवस्था में गतिशील एवं अनिवार्य भूमिका निभाता है।
भारत के संवैधानिक तंत्र को समझने की इच्छा रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए न्यायिक पुनर्विलोकन के सिद्धांत को गहराई से समझना अत्यंत आवश्यक है। JudiciaryExam.com के इस लेख में न्यायिक पुनर्विलोकन के महत्वपूर्ण पहलुओं को विभिन्न न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में सरल भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
न्यायिक पुनर्विलोकन का अर्थ
न्यायिक पुनर्विलोकन अंग्रेजी के “JUDICIAL REVIEW” का हिन्दी रूपांतरण है । इसमें शब्द “JUDICIAL” का अर्थ न्याय से संबंधित यानि न्यायिक से तथा REVIEW का अर्थ पुन: देखना या फिर से देखना या से लिया जाता है। इस तरह संयुक्त अर्थ न्यायिक पुनर्विलोकन /समीक्षा बनता है । जिसका शाब्दिक अर्थ इस प्रकार है –
शाब्दिक अर्थ है – न्यायालय द्वारा किसी कानून, सरकारी विनिश्चय या आदेश की समीक्षा/ पुनर्विलोकन करना जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह संविधान के अनुरूप है या नहीं। यह न्यायालय की वह शक्ति है जिसके अधीन वह किसी विधि को असंवैधानिक घोषित कर सकती है।
इसके अनुसार न्यायिक पुनर्विलोकन की परिभाषा निम्न प्रकार से की जा सकती है
“राज्य द्वारा बनाए गए किसी कानून की वैधता या संवैधानिकता की जांच करने तथा उसे अवैध, शून्य या
असंवैधानिक घोषित करने की न्यायालय की शक्ति, न्यायिक पुनर्विलोकन कहलता है।”
“The power of the court to examine the validity or constitutionality of any law made by
the state and to declare it illegal, void or unconstitutional is called judicial review.”
उदाहरण: सरकार एक ऐसा कानून पारित करती है, जिसके अधीन केवल वरिष्ट अधिकारी वर्ग के लोगों को सोशल मीडिया पर अपनी राय व्यक्त करने की अनुमति होगी अन्य वयक्तियों को नहीं । इस नियम से आम नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) पर प्रभाव पड़ेगा।
यदि लहुआ व अन्य व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय में याचिका इस कानून को इस आधार पर चुनौती देते हुए संस्थित करते हैं कि इससे अनुच्छेद 19(1)(a) के अधीन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन होता है। तो सुप्रीम कोर्ट इस कानून की जांच करेगा। न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि यह कानून संविधान के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं। यदि न्यायालय पाता है कि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो वह इसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
भारत में न्यायिक न्यायिक पुनर्विलोकन का संवैधानिक आधार
संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत, जहाँ न्यायिक न्यायिक पुनर्विलोकन मुख्य रूप से न्यायिक विनिश्चयों (विशेष रूप से मारबरी बनाम मैडिसन) के माध्यम से विकसित हुई, भारतीय संविधान के किसी भी उपबंध में प्रत्यक्ष रूप से न्यायिक पुनर्विलोकन का प्रावधान नहीं किया गया है, परन्तु कई अनुच्छेदों में अंतर्निहित रूप से इसका प्रावधान किया गया है, जो संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता तथा नियंत्रण व संतुलन की एक मजबूत प्रणाली स्थापित करने की मंशा को दर्शाता है।
अनुच्छेद 13 :न्यायिक पुनर्विलोकन का आधार स्तम्भ
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 ही जिसमें अधिक स्पष्टता के साथ न्यायिक पुनर्विलोकन के सिद्धांत को समाहित किया गया है। क्यों की इसमें अपबंध किया गया है की ऐसी कोई भी विधि जो मूल अधिकारों के विरुद्ध है या उन्हें छीनती है या उन्हें कम करती है, तो ऐसी विधि को उस विस्तार तक शून्य घोषित किया जा सकता है ।
अनुच्छेद 13 का मूल पाठ –
13. मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियाँ –
(1) इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले भारत के राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त सभी विधियाँ उस मात्रा तक शून्य होंगी जिस तक वे इस भाग के उपबंधों से असंगत है|
(2) राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों की छीनती है या न्यून करती है और इस खण्ड के उल्लंघन में बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य होगी|
(3) इस अनुच्छेद में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, –
(क) “विधि” के अंतर्गत भारत के राज्यक्षेत्र में विधि का बल रखने वाला कोई अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना, रूढ़ि या प्रथा है|
(ख) “प्रवृत्त विधि” के अंतर्गत भारत के राज्यक्षेत्र में किसी विधान-मण्डल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस संविधान के प्रारंभ से पहले पारित या बनाई गई विधि है जो पहले ही निरसित नहीं कर दी गई है, चाहे ऐसी कोई विधि या उसका कोई भाग उस समय पूर्णतया या विशिष्ट क्षेत्रों में प्रवर्तन में नहीं है|
[(4) इस अनुच्छेद की कोई बात अनुच्छेद 368 के अधीन किए गए संविधान के किसी सशोधन को लागू नहीं होगी|]
अनुच्छेद 13 से यह स्पष्ट होता है कि मूल अधिकार सर्वोपरि हैं और उनका उल्लंघन करने वाला कोई भी कानून अमान्य है। यह न्यायपालिका को विधायी और कार्यकारी कार्यों को असंवैधानिक घोषित करने का अधिकार देता है यदि वे मूल अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
अनुच्छेद 32 और 226: मूल अधिकारों के संरक्षक
ये अनुच्छेद व्यक्तियों को उनके मूल अधिकारों के उल्लंघन होने पर उनके प्रवर्तन के लिए क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में जाने के लिए प्रक्रियात्मक तंत्र प्रदान करते हैं, जिसमें सीधे न्यायिक पुनर्विलोकन शामिल है।
अनुच्छेद 32 का मूल पाठ
32. इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार – (1) इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय में समावेदन करने का अधिकार प्रत्याभूत किया जाता है|
(2) इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से किसी को प्रवर्तित कराने के लिया उच्चतम न्यायालय को ऐसे निदेश या आदेश या रिट, जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिवेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट है, जो भी समुचित हो, निकालने की शक्ति होगी|
(3) उच्चतम न्यायालय को खंड (1) और खंड (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, संसद्, उच्चतम न्यायालय द्वारा खंड (2) के अधीन प्रयोक्तव्य किन्हीं या सभी शक्तियों का किसी अन्य न्यायालय को अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर प्रयोग करने के लिए विधि द्वारा सशक्त कर सकेगी |
(4) इस संविधान द्वारा अन्यथा उपबंधित के सिवाय, इस अनुच्छेद द्वारा प्रत्याभूत अधिकार निलंबित नहीं किया जाएगा|
अनुच्छेद 226 का मूल पाठ
1 [226. कुछ रिट निकालने की उच्च न्यायालय की शक्ति – (1) अनुच्छेद 32 में किसी बात के होते हुए भी 2[***] प्रत्येक उच्च न्यायालय को उन राज्यक्षेत्रों में सर्वत्र, जिनके संबंध में वह अपनी अधिकारिता का प्रयोग करता है, 3[भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से किसी की प्रवर्तित कराने के लिए और किसी अन्य प्रयोजन के लिए] उन राज्यक्षेत्रों के भीतर किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को या समुचित मामलो में किसी सरकार की ऐसे निदेश, आदेश या रिट जिनके अंतर्गत 3[ बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट है, या उनमे में कोई] निकालने की शक्ति होगी|
(2) किसी सरकार, प्राधिकारी या व्यक्ति को निदेश, आदेश या रिट निकालने की खंड (1) द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग उन राज्यक्षेत्रों के संबंध में, जिनके भीतर ऐसी शक्ति के प्रयोग के लिए वाद हेतुक पूर्णत: या भागत: उत्पन्न होता है, अधिकारिता का प्रयोग करने वाले किसी उच्च न्यायालय द्वारा भी, इस बात के होते हुए भी किया जा सकेगा की ऐसी सरकार या प्राधिकारी का स्थान या ऐसे व्यक्ति का निवास-स्थान उन राज्यक्षेत्रों के भीतर नहीं है|
4 [(3) जहाँ कोई पक्षकार, जिसके विरुद्ध खंड (1) के अधीन किसी याचिका पर या उससे सबंधित किसी कार्यवाही में व्यादेश के रूप में या रोक के रूप में या किसी अन्य रीति से कोई अंतरिम आदेश –
(क) ऐसे पक्षकार को ऐसी याचिका की और ऐसे अंतरिम आदेश के लिए अभिवाक् के समर्थन में सभी दस्तवेजों की प्रतिलिपियाँ, और
(ख) ऐसे पक्षकार को सुनवाई का अवसर,
दिए बिना दिया गया है, ऐसे आदेश को रद्द कराने के लिए उच्च न्यायालय को आवेदन करता है और ऐसे आवेदन की एक प्रतिलिपि उस पक्षकार की जिसके पक्ष में ऐसा आदेश किया गया है या उसके काउंसेल को देता है वहां उच्च न्यायालय उसकी प्राप्ति की तारीख से या ऐसे आवेदन की प्रतिलिपि इस प्रकार दिए जाने की तारीख से दो सप्ताह की अवधि के भीतर, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, या जहाँ उच्च न्यायालय उस अवधि के अंतिम दिन बंद है वहां उसके ठीक बाद वाले दिन की समाप्ति से पहले जिस दिन उच्च न्यायालय खुला है, आवेदन की निपटाएगा और यदि आवेदन इस प्रकार अनहि निपटाया जाता है तो अंतरिम आदेश, यथास्थिति, उक्त अवधि की या उक्त ठीक बाद वाले दिन की समाप्ति पर रद्द हो जाएगा|]
5[(4) इस अनुच्छेद द्वारा उच्च न्यायालय को प्रदत्त शक्ति से, अनुच्छेद 32 के खंड (2) द्वारा उच्चतम न्यायालय को प्रदत्त शक्ति का अल्पीकरण नहीं होगा|]
अनुच्छेद 226 का क्षेत्र अनुच्छेद 32 से अधिक व्यापक है, क्योंकि उच्च न्यायालय न केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बल्कि “किसी अन्य उद्देश्य” (जैसे, वैधानिक अधिकारों के प्रवर्तन) के लिए भी रिट जारी कर सकते हैं। यह प्रशासनिक कार्यों पर न्यायिक पुनर्विलोकन की उच्च न्यायालयों की शक्ति का महत्वपूर्ण रूप से विस्तार करता है।
अपीलीय क्षेत्राधिकार और विशेष अनुमति याचिका (अनुच्छेद 131, 132, 133, 136)
ये अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय को व्यापक अपीलीय क्षेत्राधिकार प्रदान करते हैं, जिससे उसे निचले न्यायालयों और न्यायाधिकरणों के निर्णयों की समीक्षा करने की अनुमति प्राप्त होती है, जिसमें अंतर्निहित कार्यों की वैधता और संवैधानिकता की जांच करना समाविष्ट है।
अनुच्छेद 131: संघ व राज्यों के बीच या राज्यों के बीच विवादों में सर्वोच्च न्यायालय का आरंभिक यानि मूल क्षेत्राधिकार प्राप्त है।
अनुच्छेद 132: संविधान के निर्वचन के संबंध में विधि के महत्वपूर्ण प्रश्नों से जुड़े मामलों में उच्च न्यायालयों से अपील में सर्वोच्च न्यायालय का अपीलीय क्षेत्राधिकार।
अनुच्छेद 133: सिविल मामलों में उच्च न्यायालयों से अपील में अपीलीय क्षेत्राधिकार।
अनुच्छेद 136: “इस अध्याय में किसी बात के होते हुए भी, सर्वोच्च न्यायालय अपने विवेकानुसार, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा किसी वाद या मामले में पारित या दिए गए किसी निर्णय, डिक्री, निर्धारण, दंडादेश या आदेश के विरुद्ध अपील करने की विशेष अनुमति दे सकता है।” यह सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण शक्ति है, जो उसे अपील करने के लिए विशेष अनुमति देने अधिकार प्रदान करती है, भले ही अपील का कोई अधिकार उपलब्ध न हो, इस प्रकार यह न्यायिक पुनर्विलोकन के क्षेत्र का विस्तार करते हैं।
विधायी क्षमता और प्रतिकूलता (अनुच्छेद 245, 246, 254)
ये अनुच्छेद संघ व राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण के आधार पर न्यायिक समीक्षा करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय को समर्थ बनाते हैं ।
अनुच्छेद 245: संसद व राज्यों के विधानमंडलों द्वारा बनाई जाने वाली विधियों की सीमा तय करता है । क्षेत्रीय सीमा को परिभाषित करता है।
अनुच्छेद 246:संसद और राज्यों के विधानमंडलों द्वारा बनाए गए कानूनों की विषय-वस्तु, संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची (सातवीं अनुसूची) का संदर्भ देती है। न्यायपालिका इस बात की समीक्षा करती है कि क्या किसी विधानमंडल ने अपनी क्षमता से बाहर किसी सूची में अतिक्रमण किया है।
अनुच्छेद 254: प्रतिकूलता का सिद्धांत: यदि राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून समवर्ती सूची में किसी मामले पर संसद द्वारा बनाए गए कानून के प्रतिकूल है, तो संसदीय कानून लागू होगा, और राज्य कानून प्रतिकूलता की सीमा तक शून्य होगा।
अनुच्छेद 372: संविधान-पूर्व विधि
अनुच्छेद 372(1) में कहा गया है: “अनुच्छेद 395 में उल्लिखित अधिनियमों के इस संविधान द्वारा निरसन के बावजूद, लेकिन इस संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन, इस संविधान के लागू होने से ठीक पहले भारत के क्षेत्र में लागू सभी कानून तब तक लागू रहेंगे जब तक कि उन्हें सक्षम विधानमंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित या निरस्त या संशोधित नहीं किया जाता है।”
इस अनुच्छेद को अनुच्छेद 13(1) के साथ पढ़ने पर इसका अर्थ है कि मौजूदा कानूनों को संविधान के अनुरूप होना चाहिए, और यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो न्यायपालिका द्वारा उन्हें शून्य घोषित किया जा सकता है।
भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन का ऐतिहासिक विकास
न्यायिक पुनर्विलोकन की अवधारणा, को भारतीय संविधान में के विभिन्न प्रावधानों में स्पष्ट रूप से निहित है। यह समय के साथ और अधिक विकसित हुआ विशेष रूप से स्वतंत्रता के पश्चात । भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन के ऐतिहासिक विकास को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है ।
संविधान-पूर्व
संविधान से पहले भी, भारतीय न्यायालयों द्वारा सीमित रूप में न्यायिक पुनर्विलोकन का प्रयोग किया जाता था। भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने एक संघीय संरचना की स्थापना की एवं विधायी शक्तियों का वितरण किया, जिससे न्यायालयों को यह परीक्षण करने की अनुमति प्राप्त हुई कि विधायी निकाय अपनी निर्धारित शक्तियों के भीतर काम करते हैं या नहीं।
उदाहरण के लिए, भारत के संघीय न्यायालय (1937 में स्थापित) के पास अधिनियम के निर्वचन करने तथा विधायी सूचियों का उल्लंघन करने पर विधियों को अधिकारहीन घोषित करने की शक्ति थी। इसने संवैधानिक समीक्षा की अवधारणा के लिए एक प्रारंभिक आधार तैयार किया।
संविधान सभा में बहस
भारतीय संविधान के निर्माता, न्यायिक सर्वोच्चता के अमेरिकी मॉडल व संसदीय संप्रभुता के ब्रिटिश मॉडल दोनों से गहराई से प्रभावित थे, इसलिए उन्होंने एक बीच के मार्ग की तलाश की। उन्होंने न्यायिक शक्ति की सीमा पर व्यापक रूप से बहस की। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने न्यायिक समीक्षा के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा कि मजबूत न्यायपालिका के बिना मूल अधिकार “केवल रेत की रस्सी” होंगे। बहस से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि न्यायपालिका को असंवैधानिक कानूनों को समाप्त करने की शक्ति देने का आशय, इसे संसदीय लोकतंत्र के साथ संतुलित करना।
स्वतंत्रता के पश्चात
न्यायिक पुनर्विलोकन की यात्रा न्यायपालिका व संसद के बीच गतिशील अंतर्क्रिया द्वारा चिह्नित की गई है, जिसके परिणामस्वरूप ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन और न्यायिक निर्णय दिए गए ।
ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950 sc)
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि संविधान में अनुच्छेद 13 के अधीन सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति नहीं भी दी गई होती ,तब भी उन्हें यह शक्ति प्राप्त होती। दूसरे शब्दों में कहें तो अनुच्छेद 13 में तो एक चेतावनी के रूप में दिया गया है । इसके न् होने पर भी अनुच्छेद 32 में सर्वोच्च न्यायालय को व अनुच्छेद 226 में उच्च न्यायालय को किसी भी विधि की संवैधानिकता की जांच करने की शक्ति होती ।
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (एआईआर 1951 एससी 458): इसमें प्रथम संवैधानिक संशोधन को चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 13 के अधीन “विधि” में अनुच्छेद 368 के अधीन किए गए संवैधानिक संशोधन शामिल नहीं हैं। इसने संसद को मूल अधिकारों सहित संविधान में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्रदान की।
सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (एआईआर 1965 एससी 845): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने शंकरी प्रसाद के दृष्टिकोण को दोहराया और 17वें संशोधन की वैधता को बरकरार रखा। हालांकि, असहमत न्यायाधीशों ने मूल अधिकारों को कम करने की संसद की शक्ति के बारे में चिंता व्यक्त की।
आई.सी. गोलक नाथ और अन्य बनाम पंजाब राज्य (एआईआर 1967 एससी 1643): 6:5 के बहुमत से,ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व के मत को उलटते हुए कहा कि संसद मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।यह भी अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 368 केवल संशोधन की प्रक्रिया निर्धारित करता है, शक्ति नहीं, और अनुच्छेद 13 के अधीन संवैधानिक संशोधन “विधि” है। इससे न्यायालय को शक्ति प्राप्त हो गई कि संसद द्वारा संविधान संशोधन करके बनाई गई विधियाँ भी न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है और उनका संवैधानिक परीक्षण किया जा सकता है ।
ऐतिहासिक निर्णय और न्यायिक पुनर्विलोकन का विस्तार
भारत में संविधान लागू होने के पश्चात संवैधानिक प्रावधानों के अतिरिक्त न्यायिक पुनर्विलोकन का विस्तार समय समय पर आए प्रमुख न्यायिक निर्णयों के माध्यम से हुआ। इन निर्णयों को आईएसडी प्रकार से समझा जा सकता है ।
आधारभूत ढांचे का सिद्धांत: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (एआईआर 1973 एससी 1461)
इस मामले में एडनीर मठ के प्रमुख केशवानंद भारती ने, केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1963 को व 25वें संशोधन चुनौती दी गई, जो धार्मिक संपत्ति के स्वामित्व को सीमित करता था। इससे संसद के संशोधन की शक्ति बढ़ी और न्यायिक पुनर्विलोकन सीमित हो गया । याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 32 के अधीन दावा किया कि ये संशोधन मूल अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और संविधान के आधारभूत ढांचे को परिवर्तित करते हैं।
तब 13 न्यायाधीशों की पीठ के द्वारा 24 अप्रैल, 1973 को दिया गया यह निर्णय भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन की आधारशिला है। इसमें गोलक नाथ के मामले दिए गए निर्णय को उलटे हुए निर्णय दिया और कहा कि:
संसद को मूलअधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग को संशोधित करने की शक्ति प्राप्त है। हालांकि, यह शक्ति असीमित नहीं है। संसद संविधान के “आधारभूत संरचना” या “ढांचे” को बदल या नष्ट नहीं कर सकती।
इस समय न्यायालय ने “आधारभूत ढांचे” को विस्तृत रूप से परिभाषित नहीं किया, लेकिन इसके उदाहरण स्वरूप कई तत्वों को बताया, जिनमें शामिल हैं:
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- संविधान की सर्वोच्चता
- सरकार का गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक स्वरूप
- संविधान का धर्मनिरपेक्ष आचरण
- शक्तियों का पृथक्करण
- संविधान का संघीय स्वरूप
- राष्ट्र की एकता और अखंडता
- संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणतांत्रिक संरचना
- संसदीय प्रणाली
- विधि का शासन
- व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा
- कल्याणकारी राज्य बनाने का अधिदेश।
इस निर्णय के आधारभूत ढांचे के सिद्धांत ने प्रभावी रूप से संसद की संशोधन शक्ति पर परिसीमा अधिरोपित की , जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि संविधान की मूल पहचान अपरिवर्तनीय बनी रहे।
इस तरह से न्यायिक पुनर्विलोकन को अत्यधिक बल मिल ।
सम्यक प्रक्रिया का विकास: मेनका गांधी बनाम भारत संघ (एआईआर 1978 एससी 597)
इस निर्णय ने अनुच्छेद 21 (“किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया केअनुसार ही वंचित किया जाएगा,अन्यथा नहीं”) की व्याख्या में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। यह ” विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” (जैसा कि ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य में अपनाया गया ) की शाब्दिक व्याख्या से परे “विधि की सम्यक् प्रक्रिया” के सिद्धांत को शामिल करते हुए अधिक व्यापक दृष्टिकोण को स्वीकार किया गया ।
न्यायालय ने अवधारित किया कि “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” “, ऋजु, न्यायसंगत और युक्तियुक्त ” होनी चाहिए, न कि “मनमाना, या काल्पनिक।” इस ऐतिहासिक निर्णय ने कार्यकारी कार्रवाइयों, विशेष रूप से दैहिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने वाली कार्रवाइयों पर न्यायिक पुनर्विलोकन के विस्तार को व्यापक बना दिया, जिसमें सम्यक् प्रक्रिया में नैसर्गिक न्याय के मूल तत्व शामिल किए गए।
संवैधानिक संशोधनों की न्यायिक पुनर्विलोकन : मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ (एआईआर 1980 एससी 1789)
इस मामले ने आधारभूत ढांचे का सिद्धांत की पुष्टि करते हुए मजबूती प्रदान की । सर्वोच्च न्यायालय ने 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 की धारा 4 और 55 को निरस्त कर दिया।
42वें संशोधन की धारा 4 में मूल अधिकारों पर निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता प्रदान करने के संबंध में उपबंध करती थी। न्यायालय ने अवधारित किया कि मूल अधिकारों और निर्देशक सिद्धांतों के बीच सामंजस्य और संतुलन आधारभूत ढांचे की एक आवश्यक विशेषता है।
धारा 55 में संविधान में संशोधन करने के लिए संसद को असीमित शक्ति प्रदान करने के संबंध में उपबंध किया गया था, जिससे संवैधानिक संशोधनों की न्यायिक पुनर्विलोकन से रोका जा सके। न्यायालय ने इसे असंवैधानिक घोषित किया, और स्पष्ट रूप से कहा गया कि न्यायिक पुनर्विलोकन स्वयं संविधान का एक आधारभूत विशेषता है और इसे बाहर नहीं रखा जा सकता है।
प्रशासनिक कार्रवाई का पुनर्विलोकन : एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (एआईआर 1994 एससी 1918)
इस मामले में नौ न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय ने अनुच्छेद 356 (राज्यों में राष्ट्रपति शासन) के मनमाने उपयोग पर कुछ हद तक रोक लगाई। न्यायालय ने अवधारित किया कि राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करना न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है। राष्ट्रपति के द्वारा की गई उद्घोषणा सुसंगत कारणों पर आधारित होनी चाहिए। न्यायालय इस बात की जांच कर सकता है कि ऐसे कारण विद्यमान थे या नहीं ।
न्यायिक नियुक्तियाँ और कॉलेजियम: एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (एआईआर 1982 एससी 149)
(प्रथम न्यायाधीश मामला) और उसके बाद के मामले न्यायपालिका की अपनी नियुक्तियों में भूमिका, न्यायिक पुनर्विलोकन का विषय बन गई।
प्रथम न्यायाधीश मामला (1982): न्यायालय ने अवधारित किया कि न्यायिक नियुक्तियों में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के साथ “परामर्श” का अर्थ “सहमति” नहीं है, जो कार्यपालिका को प्राथमिकता देता है।
द्वितीय न्यायाधीश मामला (सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ, एआईआर 1994 एससी 268):
एस.पी. गुप्ता के निर्णय को उलटते हुए, न्यायिक नियुक्तियों के लिए “कॉलेजियम प्रणाली” की स्थापना की। कहा कि वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ परामर्श से बनाई गई, मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की राय को प्राथमिकता दी जाएगी।
तृतीय न्यायाधीश मामला (1998 के विशेष संदर्भ 1 के संबंध में, एआईआर 1999 एससी 1):
स्पष्ट किया गया कि कॉलेजियम में मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
हाल ही में, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम, 2014, जो कॉलेजियम प्रणाली को बदल कर नयायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के माध्यम से करने के लिए उपबंध करता था, जिसे सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन और अन्य बनाम भारत संघ (2015) 13 एससीसी 764में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनौती दी गई और अंततः असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग(एनजेएसी) न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है, जो कि आधारभूत ढांचे का एक भाग है, संस्थागत स्वतंत्रता को बनाए रखने में न्यायिक पुनर्विलोकन की महत्वपूर्ण भूमिका की पुष्टि करता है।

