सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को अपास्त कर दिया है, जिसमें राज्य सरकार को निर्देश दिया गया था कि वह उन उम्मीदवारों पर विचार करे, जिन्होंने प्रारंभिक शिक्षा में 18 महीने का डिप्लोमा (D.El.Ed.) राज्य में सहायक शिक्षक (प्राथमिक) के पद के लिए, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (एनआईओएस) द्वारा ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग (ओडीएल) मोड के माध्यम से पूर्ण कर लिया है।
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यह निर्णय स्वयं की समझ एवं भारत सरकार के विधिक शब्दावली के आधार पर उच्चतम न्यायालय के मूल निर्णय से अनुवादित किया गया। यह किसी भी प्रकार की सलाह नहीं है और न ही किसी भी निश्चय पर पहुंचने में विश्वास किया जाना चाहिए। किसी भी चूक या विसंगति के मामले में, मूल अभिलेखों में प्रदत जानकारी अंतिम और बाध्यकारी होगी। |
न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने उत्तराखंड राज्य और कुछ उम्मीदवारों द्वारा दायर अपीलों की अनुमति दी, जिन्होंने 2 साल D.El.Ed पूरा कर लिया था तथा अभिनिर्धारित किया कि उच्च न्यायालय ने यह निर्णय लेने में गलती की, कि 18 माह का डी.ई.एल.एड.(D.El.Ed) एनआईओएस (NIOS) द्वारा मुक्त और दूरस्थ (ODL) तरीके के माध्यम से संचालित डिप्लोमा, 2 वर्ष के डिप्लोमा के बराबर है, जैसा कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) की 23 अगस्त 2010 और 29 जुलाई 2011 की अधिसूचना के तहत आवश्यक है।
पीठ ने कहा कि D.El.Ed के संचालन के लिए एनसीटीई द्वारा 22 सितंबर 2017 को जारी मान्यता आदेश। ओडीएल मोड के माध्यम से एनआईओएस द्वारा कार्यक्रम केवल 10 अगस्त 2017 को या उससे पहले नियुक्त सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में काम करने वाले प्राथमिक स्तर पर सेवारत अप्रशिक्षित शिक्षकों के लिए था। पीठ ने आगे कहा कि उक्त आदेश पूरे भारत में 31 मार्च 2019 तक लगभग 11 लाख सेवाकालीन अप्रशिक्षित शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता और प्रशिक्षण के अधिग्रहण को सक्षम बनाने के लिए जारी किया गया था ताकि बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा (संशोधन) अधिनियम, 2017 को लागू किया जा सके।
पीठ ने यह भी कहा कि उत्तराखंड राज्य द्वारा बनाए गए 2012 के सेवा नियमों में 2 वर्ष का D.El.Ed निर्धारित किया गया है।पाठ्यक्रम, प्राथमिक विद्यालयों में सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता के रूप में और विभिन्न जिला शिक्षा अधिकारियों द्वारा जारी विज्ञापनों में भी समान योग्यता प्रदान की गई थी। पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ऐसे सेवा नियमों और उन विज्ञापनों के विपरीत परमादेश जारी नहीं कर सकता था जो चुनौती के अधीन नहीं थे।
पीठ ने राम शरण मौर्य बनाम U.P., (2021) 5 SCC 401 के मामले में सुप्रीम कोर्ट केनिर्णय पर NCTE के विद्वान अधिवक्ता द्वारा रखी गई निर्भरता को भी खारिज कर दिया और कहा कि उक्त निर्णय वर्तमान मामले पर लागू नहीं होता है।
इसलिए पीठ ने उच्च न्यायालय के आक्षेपित निर्णय व आदेश को खारिज कर दिया तथा मूल याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया।
केस टाइटल : जयवीर सिंह व अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य व अन्य (2023)sc